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अनाज का भंडार, कुपोषण का दंश : ब्रिक्स की थाली में सब कुछ, फिर भी करोड़ों लोग भूखे और कुपोषित

जया जुमरानी एवं शिव कुमार Published by: Umashankar Mishra Updated Thu, 11 Jun 2026 05:51 PM IST
सार

ब्रिक्स देशों में दुनिया की आधी आबादी रहती है। ये देश सबसे बड़े कृषि उत्पादक होने के बावजूद भूख और कुपोषण से उबर नहीं पाए हैं। ब्राजील सोयाबीन निर्यात करता है, पर वहां करोड़ों लोग भूखे हैं, भारत अनाज बेचता है, मगर यहां हर तीसरा बच्चा कुपोषित है, इथियोपिया को गठबंधन की सदस्यता तो मिली, लेकिन ठोस मदद नहीं मिल सकी। न्यू डेवलपमेंट बैंक का ध्यान अब तक खाद्य प्रणालियों पर नगण्य रहा है। वहीं, निर्यात-प्रतिबंधों ने एकजुटता की बात खोखली कर दी है। अब वक्त है कि ब्रिक्स खाद्य सुरक्षा को बाध्यकारी एजेंडा बनाए, महिलाओं और छोटे किसानों को नीति के केंद्र में लेकर आए। 

वर्ष 2026 में भारत की अध्यक्षता में ब्रिक्स देशों का संगठन "मानवता प्रथम" के नारे के साथ बढ़ रहा है।
वर्ष 2026 में भारत की अध्यक्षता में ब्रिक्स देशों का संगठन "मानवता प्रथम" के नारे के साथ बढ़ रहा है। - फोटो : AI
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विस्तार
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भारत ने वर्ष 2026 में ब्रिक्स की अध्यक्षता संभाली, जिसकी थीम है - "लचीलापन और नवाचार के साथ सहयोग और स्थिरता का निर्माण।" नई दिल्ली ने अपनी अगुवाई को "मानवता प्रथम" के नजरिये से परिभाषित किया है। इसका मतलब साफ है कि ब्रिक्स को सिर्फ पश्चिमी संस्थाओं के दबदबे की काट के रूप में नहीं, बल्कि ऐसे गठबंधन के तौर पर देखा जाए, जो आम इंसान की जिंदगी बेहतर बनाए। मगर, सवाल यह है कि क्या ब्रिक्स वाकई ऐसा कर पा रहा है?

वर्ष 2026 में भारत की अध्यक्षता में ब्रिक्स देशों का संगठन "मानवता प्रथम" के अपने नारे के साथ चल रहा है। लेकिन, इस गठबंधन के सामने एक कड़वा सच है। दुनिया की आधी आबादी और सबसे बड़े कृषि उत्पादकों को समेटने वाला यह ब्लॉक अपने ही लोगों की भूख और कुपोषण नहीं मिटा पा रहा।

दायरा बड़ा हुआ, पर भूख नहीं मिटी

वर्ष 2024 में ब्रिक्स में मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हुए। वर्ष 2025 की शुरुआत में इंडोनेशिया भी जुड़ गया। जब ये देश जोड़े गए, तो कहा गया कि यह पश्चिमी दबदबे वाली संस्थाओं के खिलाफ एक बहुध्रुवीय दुनिया की तरफ कदम है। लेकिन, जो बात कम कही गई, वह यह थी कि अब यह गठबंधन दुनिया की करीब आधी आबादी का घर है। इसमें कुछ सबसे उपजाऊ कृषि क्षेत्र भी हैं और कुछ ऐसे देश भी शामिल हैं, जहां खाने की भारी किल्लत है।

ऐसे में, यह सवाल उठता है कि क्या ब्रिक्स अपने ही लोगों का पेट भर सकता है? जवाब असहज करने वाला है। ब्रिक्स देश दुनिया के सबसे बड़े कृषि उत्पादक हैं और विश्व के सबसे ज्यादा भूखे लोगों का बोझ भी इन्हीं के कंधों पर है। यह कोई संयोग नहीं है, न ही यह कोई अस्थायी समस्या है। यह एक ढांचागत खामी है, जिसका ढांचागत हल ढूंढना होगा।

गठबंधन के भीतर का विरोधाभास

यह विरोधाभास तब और साफ दिखाई देता है, जब हम एक-एक देश को देखते हैं। ब्राजील दुनिया के सबसे बड़े कृषि निर्यातकों में से एक है, जिसका सोयाबीन, बीफ और चीनी में कोई जवाब नहीं। लेकिन, वर्ष 2022 के राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार, वहां करीब 15.5 फीसदी आबादी भूखी थी। वर्ष 2025 में ब्राजील को संयुक्त राष्ट्र के भूख-मानचित्र से हटाया गया। यह सरकार के उस ठोस प्रयास का नतीजा था, जिसमें नकद हस्तांतरण और स्कूली भोजन जैसी 80 से ज्यादा योजनाएं एक साथ चलाई गईं। फिर भी लाखों ब्राजीलियाई लोग आज भी खाद्य असुरक्षा में जी रहे हैं।

यह समस्या उत्पादन की नहीं, बल्कि आय में असमानता और कृषि व्यवसाय की राजनीति की है, जो गरीबों को बाहर रखती है।

भारत इस साल ब्रिक्स गठबंधन का अध्यक्ष है और यह स्थिति एक ईमानदार आईना भी है। भारत ने अकाल को पीछे छोड़ दिया है और अब खाद्यान्न निर्यातक देश बन गया है। लेकिन, पांच साल से कम उम्र के बच्चों में बौनापन (stunting) की दर यहां दुनिया में सबसे ऊंची है और हर तीन में से एक बच्चा बौनेपन का शिकार है।

सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) हर महीने करीब 80 करोड़ लोगों को सब्सिडी वाला अनाज देती है, जो एक बड़ा सुरक्षा जाल है। भारतीय थाली में कैलोरी तो है, मगर प्रोटीन और जरूरी पोषक तत्व पर्याप्त नहीं हैं। इथियोपिया इस सूची में सबसे निचले पायदान पर है। संघर्ष, बार-बार आने वाले सूखे और विदेशी मदद पर निर्भर खाद्य प्रणाली ने वहां लाखों लोगों को खतरे में डाल रखा है।

यहां एक जरूरी सवाल उठता है कि जब इथियोपिया को ब्रिक्स की सदस्यता दी गई, तो खाद्य सुरक्षा को लेकर उससे कौन-सी ठोस प्रतिबद्धताएं की गईं? जितना पता चलता है, वह बहुत कम है।

ब्रिक्स की संस्थागत कमजोरी बड़ी वजह

यहां ब्रिक्स की संस्थागत कमजोरी भी एक बड़ी वजह है। तमाम शिखर बैठकों, कार्यसमूहों और साउथ-साउथ एकजुटता के ऐलानों के बावजूद ब्रिक्स ने खाद्य सुरक्षा के लिए कोई ठोस और एकीकृत ढांचा नहीं बनाया। दूसरे संगठनों से तुलना करें तो फर्क साफ दिखाई देता है। यूरोपीय संघ की साझा कृषि नीति (CAP) सदस्य देशों के बीच संसाधनों का पुनर्वितरण करती है। आसियान के पास आपातकालीन चावल भंडार है। अफ्रीकी संघ के मापुटो घोषणापत्र ने कृषि निवेश के लिए स्पष्ट लक्ष्य तय किए थे। ब्रिक्स के पास ऐसा कोई केंद्रीकृत तंत्र नहीं है और यहां ज्यादातर काम द्विपक्षीय समझौतों से होता है, न कि एकीकृत बहुपक्षीय नीतियों से।

न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB), जो ब्रिक्स की सबसे प्रमुख वित्तीय संस्था है, से बड़ी उम्मीदें थीं। लेकिन, खाद्य प्रणालियों में इसके निवेश का रिकॉर्ड निराशाजनक रहा है। NDB ने मुख्यतः सड़कें, ऊर्जा और शहरी ढांचे में पैसा लगाया, मगर ग्रामीण खाद्य प्रणालियों, खेती के लचीलेपन या पोषण पर इसका ध्यान नगण्य रहा। जब तक NDB समर्पित खाद्य प्रणाली अनिवार्यता नहीं अपनाता, तब तक असली पूंजी और मापने योग्य लक्ष्यों के साथ यह एक बड़ी चूक बनी रहेगी।

निर्यात और राष्ट्रवाद शायद सबसे नुकसानदेह रवैया है। जुलाई, 2023 में भारत ने गैर-बासमती सफेद चावल के निर्यात पर प्रतिबंध लगाया, जिससे एशिया और अफ्रीका के बाजारों में कीमतें उछल गईं और नुकसान उन्हीं लोगों को हुआ, जिनकी बात ब्रिक्स करता है। रूस ने यूक्रेन पर हमले के बाद अनाज के प्रवाह को भू-राजनीतिक हथियार बना दिया। नतीजा यह हुआ कि जो गठबंधन पश्चिमी स्वार्थ की आलोचना करता है, उसने व्यवहार में खुद वही दोहराया है।

कैलोरी से आगे कुपोषण का तिहरा संकट

इन सब राजनीतिक एवं आर्थिक विफलताओं के नीचे एक और संकट दबा है, जिस पर कम ध्यान जाता है। ब्रिक्स देशों में कुपोषण का तिहरा बोझ है। सबसे पहला बोझ ग्रामीण और शहरी गरीबों में कुपोषण और बौनेपन की समस्या है। दूसरा - कई सदस्य देशों में आयरन, जिंक और आयोडीन की कमी है। तीसरा बोझ मोटापे, अधिक वजन और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों की तेजी से बढ़ती समस्या है।

दक्षिण अफ्रीका के उप-सहारा क्षेत्र में मोटापे की दर सबसे ऊंची दरों में से एक है। चीन में टाइप-2 मधुमेह तेजी से बढ़ रहा है। ब्राजील में एक ही घर में भूख और मोटापा साथ-साथ मिलते हैं। यह सब खाने की कमी नहीं, बल्कि सस्ते और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य उत्पादों के गरीब बस्तियों में पांव पसारने का नतीजा है।

इस बोझ का सबसे ज्यादा असर महिलाओं पर पड़ता है। भारत, इथियोपिया और ग्रामीण चीन में महिलाओं और लड़कियों में खून की कमी (एनीमिया) और पोषक तत्वों की कमी चिंताजनक स्तर पर है। यह सीधे तौर पर पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाले बौनेपन और मानसिक विकास की कमी से जुड़ा है। इसीलिए, किसी भी गंभीर खाद्य और पोषण एजेंडा में महिलाओं की पोषण स्वायत्तता यानी विविध आहार तक पहुंच और घरेलू खाद्य निर्णयों में उनकी भूमिका को केंद्र में रखना जरूरी है।

भारत की अध्यक्षता में तीन जरूरी कदम

भारत एक साल में यह सब नहीं सुलझा सकता, लेकिन इसकी केंद्रित अध्यक्षता कुछ निर्णायक बदलाव ला सकती है।

(I) खाद्य सुरक्षा और बेहतर पोषण को ब्रिक्स सहयोग का एक औपचारिक स्तंभ बनाया जाए। सिर्फ भाषण नहीं, बल्कि बाध्यकारी लक्ष्यों वाला एक समझौता होना चाहिए, जैसे बौनेपन और एनीमिया में कमी के लक्ष्य, ग्रामीण आबादी के लिए न्यूनतम सामाजिक सुरक्षा, साथी सदस्यों को नुकसान पहुंचाने वाले निर्यात-प्रतिबंधों पर रोक और आपातकालीन खाद्य भंडार की साझेदारी। ये राजनीतिक रूप से कठिन प्रतिबद्धताएं हैं, लेकिन प्रयास करने लायक हैं।

(II) गठबंधन के पास जो विशाल कृषि ज्ञान भंडार है, उसे सबके फायदे के लिए इस्तेमाल किया जाए। चीन की सटीक खेती, भारत का बड़े पैमाने पर सार्वजनिक वितरण का अनुभव, ब्राजील की छोटे किसानों को कर्ज देने की सफलता और यूएई की रेगिस्तान में खाद्य उत्पादन की तकनीक - यह सब एक साझा संपदा है। एक महत्वाकांक्षी प्रौद्योगिकी हस्तांतरण ढांचा इसे ऐसी शर्तों पर साझा कर सकता है, जो स्थानीय क्षमता बनाए, नई निर्भरताएं नहीं।

(III) छोटे किसानों और महिला उत्पादकों को ब्रिक्स कृषि नीति के केंद्र में लाया जाए। अभी बड़े पैमाने पर निर्यात-उन्मुख उत्पादन पर ध्यान दिया जाता है। इससे राष्ट्रीय उत्पादन तो बढ़ाता है, लेकिन ग्रामीण आजीविका कमजोर होती है और पर्याप्त रोजगार के बिना शहरीकरण बढ़ता है। पूरे ब्लॉक में किसानों की उम्र बढ़ रही है, क्योंकि युवा शहरों की ओर जा रहे हैं और एक बड़ा सवाल उठता है कि 'खेत कौन जोतेगा?' इसके लिए भूमि अधिकारों में सुधार, महिलाओं को संपत्ति और कर्ज के अधिकार और ऐसी व्यापार नीति जरूरी है, जो कृषि व्यवसाय के हित में छोटे किसानों को नुकसान न पहुंचाए।

ब्रिक्स को अंततः इस बात से नहीं आंका जाएगा कि उसने डॉलर को चुनौती दी या संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को नया आकार दिया, बल्कि इस बात से आंका जाएगा कि उसने अपने लोगों की जिंदगी बेहतर बनाई या नहीं।

गठबंधन के पास पैमाना है, विशेषज्ञता है और सिद्धांत रूप में इरादा भी है। सवाल यह है कि क्या वह खाद्य सुरक्षा और पोषण को अपने सबसे कमजोर सदस्यों के लिए एक असली काम में बदलेगा या इसे भी एक और खूबसूरत भाषण तक सीमित रखेगा। यही ब्रिक्स की सबसे बड़ी परीक्षा है।

(लेखक द्वय आईसीएआर-राष्ट्रीय कृषि अर्थशास्त्र एवं नीति अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली में क्रमशः वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रभारी निदेशक हैं। लेख में व्यक्त विचार लेखकों के निजी हैं और संस्थान के विचारों को नहीं दर्शाते।)


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