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प्रतिबंध के बावजूद बिक रही थाई मांगुर : सस्ती होने के कारण लोग नहीं छोड़ पा रहे कैंसर फैलाने वाली मछली का मोह

राहुल कुमार गौरव, सुपौल (बिहार) Published by: Umashankar Mishra Updated Tue, 20 Jan 2026 03:12 PM IST
सार

बिहार के सुपौल जिला स्थित सिमराही बाजार में मछली खरीद रहे विक्रम महतो बताते हैं, अधिकांश मछलियों के दाम 200 से 250 रुपये के बीच है। जबकि, थाई मांगुर मछली 100-150 रुपये में मिल जाती है। गरीब लोगों के लिए 100-150 रुपये का अंतर काफी हो जाता है।

थाई मांगुर को तेजी से बड़ा करने के लिए कई जगहों पर नालों, सीवर और गंदे पानी में पाला जाता है।
थाई मांगुर को तेजी से बड़ा करने के लिए कई जगहों पर नालों, सीवर और गंदे पानी में पाला जाता है। - फोटो : राहुल कुमार गौरव
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विस्तार
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सरकार द्वारा पूरी तरह प्रतिबंधित किए जाने के बावजूद बिहार के अधिकांश बाजारों में थाई मांगुर मछली खुलेआम बिकती है। इसी क्रम में सुपौल जिला स्थित मुरलीगंज हाट बाजार से लेकर बलुआहा घाट और जीतापुर बाजार में भी इस मछली को बिकते हुए देखा गया। सस्ती कीमत के कारण निम्न आय वर्ग के लोग इसका सेवन बड़ी संख्या में कर रहे हैं।

देसी मछलियों की तुलना में थाई मांगुर सस्ती मिल जाती है। जहां देशी मछलियां 250-600 रुपये प्रति किलोग्राम मिलती है, तो थाई मांगुर 100-150 रुपये में उपलब्ध होती है। कम कीमत होने के कारण बिहार जैसे गरीब राज्यों में यह मछली आसानी से उपलब्ध हो जाती है, लेकिन उन्हें इसके गंभीर स्वास्थ्य दुष्प्रभाव का अंदाजा नहीं है। थाई मांगुर मछली खरीद रहे अधिकांश लोगों को इस बात की जानकारी भी नहीं थी कि यह मछली प्रतिबंधित है। प्रतिबंध लागू होने के बावजूद मत्स्य विभाग द्वारा किसी प्रकार की कार्रवाई नहीं की जा रही है, न ही नियमित निगरानी की व्यवस्था है।

यह एक विदेशी प्रजाति की मछली है, जिसका प्रमुख रूप से पालन थाईलैंड और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में बड़े पैमाने पर किया जाता है। इसकी विशेषता यह है कि यह बहुत तेजी से बढ़ती है और इसे पालना अपेक्षाकृत सस्ता होता है। इसी कारण एक समय में भारत के कई हिस्सों में इसका पालन शुरू कर दिया गया था। हालांकि, समय के साथ इसके सेवन से जुड़ी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं की जानकारी सामने आने लगी। इसके बाद चिंताएं बढ़ीं और सरकार ने इस मछली पर प्रतिबंध लगा दिया।

थाई मांगुर मछली की बिक्री पर सबसे पहले 1998 में केरल में प्रतिबंध लगाया गया था। इसके विनाशकारी परिणाम को देखते हुए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल एवं भारत सरकार ने 25 वर्ष पहले सन 2000 में इसके पालन व बिक्री पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा रखा है। इस आदेश का उल्लंघन करने वालों पर जुर्माने के साथ जेल की सजा तक का प्रावधान है।


कई स्थानों पर इन मछलियों का वजन बढ़ाने के लिए हार्मोन और केमिकल का इस्तेमाल किया जाता है।
कई स्थानों पर इन मछलियों का वजन बढ़ाने के लिए हार्मोन और केमिकल का इस्तेमाल किया जाता है। - फोटो : राहुल कुमार गौरव
पश्चिम बंगाल से आ रही मछली
सिमराही बाजार में एक कारोबारी नाम ना बताने की शर्त पर बताया कि, “पश्चिम बंगाल से थाई मांगुर खरीदते हैं। वहां बांग्लादेश से यह मछली आती है। किशनगंज बॉर्डर के रास्ते से यह बांग्लादेश से पश्चिम बंगाल पहुंचती है। इसके बाद, हर दिन ट्रकों में भरकर सिलीगुड़ी से पूर्णिया के रास्ते एनएच-27 से सिमराही बाजार तक आती है। एक ट्रक पर तकरीबन 150 हांडी रहती है। यहीं से थोक व्यापारियों के माध्यम से जिले के सभी बाजारों तक मछली जाती है।”

भारी धातुएं और विषैले पदार्थ
सहरसा के डॉक्टर ओमप्रकाश के अनुसार, थाई मांगुर मछली में ऐसे टॉक्सिन्स पाए जाते हैं जो सेहत के लिए बेहद हानिकारक हो सकते हैं। बताया जाता है कि इस मछली में कैंसर उत्पन्न करने वाले तत्व भी मौजूद होते हैं। इसका बड़ा कारण यह है कि इस मछली को अक्सर कम गुणवत्ता वाले या प्रदूषित जलस्रोतों में पाला जाता है, जहां पानी में भारी धातुएं और विषैले पदार्थ होते हैं। ये जहरीले तत्व मछली के मांस में जमा हो जाते हैं और इसके सेवन से वे हमारे शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। इससे शरीर के कई अंग प्रभावित हो सकते हैं और लंबे समय में यही टॉक्सिन्स कैंसर जैसी गंभीर बीमारी का कारण बन सकते हैं। सामान्य मछलियों की तुलना में इन जहरीले पदार्थों की मात्रा थाई मांगुर मछली में कहीं अधिक पाई जाती है।

देसी मांगुर और थाई मांगुर में अंतर 
बिहार में 2008 में देसी मांगुर राजकीय मछली घोषित की गई थी। कम पानी, कीचड़ और नमी वाली मिट्टी की मांद में बाहरी ऑक्सीजन पर जिंदा रहने वाली मांगुर मछली की प्रजाति बिहार में अधिक पाई जाती है। पुराने पोखर और जलस्रोतों के सूखने से संकट और गहरा जाता है, तब सरकार ने अन्य प्रदेशों की तरह मांगुर को संरक्षित करने के लिए राजकीय मछली घोषित किया। वायुश्वासी प्रजाति की यह मछली औषधीय गुणों से भरपूर है।

12 नवंबर 2025 को हेमंत कैबिनेट ने भी "देसी मांगुर" को झारखंड की 'राजकीय मछली' का दर्जा देने वाले प्रस्ताव पर अपनी सहमति दे दी है। देसी मांगुर और थाई मांगुर मछली में बहुत अंतर है। लेकिन, अधिकांश लोग इन दोनों मछली को एक ही जैसा समझ लेते हैं। 

जिम्मेदारों की उदासीनता व लापरवाही के चलते बिहार में कई स्थानों पर धड़ल्ले से थाई मांगुर मछली की बिक्री हो रही है। प्रतिबंध लागू होने के बावजूद मत्स्य विभाग द्वारा किसी प्रकार की कार्रवाई नहीं की जा रही है, न ही नियमित निगरानी की व्यवस्था है।

थाई मांगुर को तेजी से बड़ा करने के लिए कई जगहों पर नालों, सीवर और गंदे पानी में पाला जाता है। कई स्थानों पर इनके वजन बढ़ाने के लिए हार्मोन और केमिकल का इस्तेमाल किया जाता है। 

बिक्री करने वालों से जब पूछा गया कि प्रतिबंध के बाद भी इसे क्यों बेचा जा रहा है, तो सभी ने चुप्पी साध ली। एक ने बताया कि थाई मांगुर मछली सस्ती मिलने के कारण ज्यादा मुनाफा देती है। 
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