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Teacher’s Day: इन 5 शिक्षकों ने बदली सरकारी स्कूलों की तस्वीर, अब छुट्टी में भी स्कूल आने को तैयार बच्चे

मोहम्मद आमिल, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Sat, 05 Sep 2026 03:08 PM IST
सार

आज शिक्षक दिवस है। यह दिन भारत के दूसरे राष्ट्रपति और महान शिक्षाविद् डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। यह दिन उन शिक्षकों को याद करने और उनके योगदान को सम्मान देने का अवसर है, जिन्होंने अपनी मेहनत, समर्पण और प्रतिभा से न सिर्फ बच्चों को पढ़ाया, बल्कि उनके भीतर सीखने और आगे बढ़ने का जज्बा भी पैदा किया। शिक्षक दिवस के मौके पर पढ़िए उत्तर प्रदेश के ऐसे ही पांच शिक्षकों की कहानी, जिन्होंने अपनी अनूठी शिक्षण शैली और मेहनत से सरकारी स्कूलों की तस्वीर बदलने की कोशिश की।

शिक्षकों ने बच्चों में जगाया पढ़ाई का जुनून
शिक्षकों ने बच्चों में जगाया पढ़ाई का जुनून - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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सरकारी स्कूलों की तस्वीर बदलने के लिए हमेशा बड़े बजट, महंगे संसाधनों या अत्याधुनिक इमारतों की जरूरत नहीं होती। कई बार एक शिक्षक का जुनून, बच्चों को समझने की कोशिश और पढ़ाने का अलग अंदाज ही पूरे विद्यालय की दिशा बदल देता है। उत्तर प्रदेश के अलग-अलग जिलों में ऐसे शिक्षक मौजूद हैं, जिन्होंने सरकारी स्कूलों को सिर्फ पढ़ाई की जगह नहीं रहने दिया, बल्कि उन्हें बच्चों के लिए सीखने, खेलने, प्रयोग करने और सपने देखने की जगह बना दिया।

कहीं डांस और सिंगिंग के जरिए बच्चों का स्कूल से जुड़ाव बढ़ा, तो कहीं क्यूआर कोड और एआर-वीआर तकनीक ने पढ़ाई को किताबों से बाहर की दुनिया से जोड़ दिया। किसी शिक्षक ने गीत, कविता और नाटक को पढ़ाई का माध्यम बनाया, तो किसी ने कठपुतली के जरिए गणित और विज्ञान जैसे कठिन विषयों को बच्चों के लिए आसान और मजेदार बना दिया। इनकी कहानियां बताती हैं कि बदलाव के लिए संसाधनों से ज्यादा जरूरी है एक शिक्षक की सोच, जुनून और बच्चों के लिए कुछ अलग करने का जज्बा। आइए मिलते हैं इन शिक्षकों से...
कौशलेश मिश्रा, मुरारमऊ प्राथमिक विद्यालय, रायबरेली 
कौशलेश मिश्रा, मुरारमऊ प्राथमिक विद्यालय, रायबरेली  - फोटो : गांव जंक्शन

1- जब सरकारी स्कूल में लगी डांस क्लास, 95 फीसदी से ऊपर पहुंची उपस्थिति


कौशलेश मिश्रा, मुरारमऊ प्राथमिक विद्यालय, रायबरेली 
रायबरेली के भवानीदीनपुर स्थित मुरारमऊ प्राथमिक विद्यालय में स्कूल की घंटी बजने का मतलब सिर्फ किताब खोलना नहीं है। यहां बच्चों के लिए पढ़ाई के साथ डांस, सिंगिंग और खेल भी सीखने का मौका है। इसकी वजह हैं सहायक अध्यापक कौशलेश मिश्रा। बच्चों के बीच ‘छोटे वाले सर’ के नाम से चर्चित कौशलेश ने पढ़ाई को बच्चों के लिए दिलचस्प बनाने के लिए ऐसे प्रयोग किए, जिनका असर विद्यालय की पूरी तस्वीर पर दिखाई देने लगा।

सरकारी स्कूलों में बच्चों की नियमित उपस्थिति एक बड़ी चुनौती मानी जाती है। खासकर ग्रामीण इलाकों में कई बार बच्चों को स्कूल तक लाना और फिर उन्हें लगातार विद्यालय से जोड़े रखना आसान नहीं होता। कौशलेश मिश्रा ने इस चुनौती का जवाब पारंपरिक तरीके से नहीं, बल्कि बच्चों की रुचि को समझकर दिया। उन्होंने स्कूल में ऐसी गतिविधियों को जगह दी, जिनमें बच्चों को आनंद आता है। पढ़ाई के साथ डांस, सिंगिंग और स्पोर्ट्स को जोड़ने से विद्यालय बच्चों के लिए आकर्षण का केंद्र बनने लगा।

कौशलेश की कोशिश का सबसे बड़ा असर बच्चों की उपस्थिति में दिखाई देता है। स्कूल में अब उपस्थिति 95 फीसदी से ऊपर रहती है। यानी जिन बच्चों के लिए कभी स्कूल जाना महज एक जिम्मेदारी रहा होगा, वे अब नियमित रूप से विद्यालय पहुंचने लगे हैं। यह बदलाव सिर्फ आंकड़ा नहीं है, बल्कि इस बात का संकेत है कि जब स्कूल का माहौल बच्चों की रुचि और उत्साह के अनुरूप बनाया जाता है तो उनकी पढ़ाई से दूरी कम हो सकती है।

कौशलेश ने विद्यालय को सिर्फ कक्षा और ब्लैकबोर्ड तक सीमित नहीं रखा। उनकी कोशिश है कि बच्चे अलग-अलग गतिविधियों के माध्यम से अपनी प्रतिभा पहचानें और सीखने को बोझ न समझें। डांस और सिंगिंग के साथ खेलों में प्रशिक्षण बच्चों के आत्मविश्वास को बढ़ाने का भी माध्यम बन रहा है। उनके समर्पण का एक और पहलू यह है कि स्कूल आने में उन्हें देर न हो, इसके लिए उन्होंने गांव में ही अपना घर बनवा लिया। इससे उनके लिए विद्यालय से लगातार जुड़े रहना आसान हुआ।
 
रविकांत द्विवेदी, प्राथमिक विद्यालय भगेसर, मिर्जापुर
रविकांत द्विवेदी, प्राथमिक विद्यालय भगेसर, मिर्जापुर - फोटो : गांव जंक्शन

2- 95वें पायदान से पांचवें स्थान तक, सामुदायिक सहयोग से बदला भगेसर स्कूल

रविकांत द्विवेदी, प्राथमिक विद्यालय भगेसर, मिर्जापुर
मिर्जापुर के प्राथमिक विद्यालय भगेसर की कहानी किसी बदलाव की रिपोर्ट से कम नहीं है। कभी विद्यालय की रैंकिंग 95वें स्थान पर थी, लेकिन प्रधानाध्यापक रविकांत द्विवेदी की मेहनत और सामुदायिक सहयोग ने इसकी तस्वीर बदल दी। आज विद्यालय की रैंकिंग पांचवें स्थान तक पहुंच चुकी है और यहां पढ़ने वाले बच्चे स्कूल बंक नहीं करना चाहते। शिक्षक दिवस के मौके पर रविकांत की कहानी इसलिए खास है क्योंकि उन्होंने स्कूल की बेहतरी को सिर्फ अपनी जिम्मेदारी नहीं माना, बल्कि पूरे समुदाय को उससे जोड़ दिया।

किसी सरकारी स्कूल को बदलना सिर्फ शिक्षक के प्रयास से संभव नहीं होता। उसके लिए अभिभावकों और ग्रामीणों का भरोसा भी जरूरी होता है। रविकांत द्विवेदी ने इसी भरोसे को विद्यालय की ताकत बनाया। उन्होंने समुदाय को स्कूल की गतिविधियों से जोड़ा और संसाधनों की कमी को सामूहिक सहयोग से पूरा करने की कोशिश की।

आज भगेसर प्राथमिक विद्यालय में बच्चों के लिए हर कक्षा में एलईडी टीवी और कूलर जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं। पढ़ाई को रोचक बनाने के लिए नवीन तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। विद्यालय में खेलकूद की गतिविधियां भी होती हैं, ताकि बच्चों का विकास सिर्फ किताबों तक सीमित न रहे।

विद्यालय की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक बच्चों की स्कूल के प्रति बदलती रुचि है। यहां बच्चे अनुपस्थित रहना या स्कूल बंक करना नहीं चाहते। यह बदलाव किसी एक दिन में नहीं आया। इसके पीछे लगातार किए गए प्रयास, बेहतर वातावरण और बच्चों को सीखने के लिए प्रेरित करने वाली गतिविधियां हैं।

रविकांत की पहल का असर बच्चों की उपलब्धियों में भी दिखाई देता है। विद्यालय के बच्चों का चयन नवोदय विद्यालय के लिए भी हुआ है। इसका अर्थ है कि सरकारी स्कूल के बच्चे भी सही वातावरण और मार्गदर्शन मिलने पर आगे बढ़ने के अवसर हासिल कर सकते हैं।

रविकांत द्विवेदी को वर्ष 2021 में राज्य अध्यापक पुरस्कार मिल चुका है। अब शिक्षक दिवस के अवसर पर उन्हें राष्ट्रपति सम्मान मिलने की बात इस कहानी को और महत्वपूर्ण बनाती है। लेकिन उनके काम की असली पहचान पुरस्कार से आगे है- वह बच्चों का बदला हुआ रवैया और स्कूल की बदली हुई तस्वीर है। उनका मॉडल इस बात का उदाहरण है कि सरकारी स्कूल सिर्फ सरकारी व्यवस्था के भरोसे नहीं चलते। जब शिक्षक समुदाय को साथ लेकर चलता है तो विद्यालय के संसाधन भी बढ़ते हैं और अभिभावकों का भरोसा भी मजबूत होता है।


लाल सिंह, ददिउरी प्राथमिक विद्यालय, शाहजहांपुर
लाल सिंह, ददिउरी प्राथमिक विद्यालय, शाहजहांपुर - फोटो : गांव जंक्शन

3- घुटनों के बल स्कूल पहुंचकर हासिल की डिग्रियां, अब गीत-कविता और नाटक से रोशन कर रहे बच्चों का भविष्य

लाल सिंह, ददिउरी प्राथमिक विद्यालय, शाहजहांपुर
दो साल की उम्र में पोलियो ने लाल सिंह की शारीरिक क्षमता को प्रभावित किया, लेकिन शिक्षा के प्रति उनका जुनून कभी कमजोर नहीं पड़ा। पिता उन्हें डॉक्टर बनाना चाहते थे, लेकिन गांव में विज्ञान शिक्षक और संसाधनों की कमी के कारण वह सपना पूरा नहीं हो सका। इसके बावजूद लाल सिंह ने हार नहीं मानी। घुटनों के बल स्कूल जाते हुए उन्होंने बीएड, एमए इंग्लिश और नेट की योग्यता हासिल की। आज शाहजहांपुर के ददिउरी प्राथमिक विद्यालय में सहायक अध्यापक के रूप में वह गीत, कविता और नाटक के जरिए बच्चों को पढ़ा रहे हैं।

लाल सिंह की कहानी सिर्फ संघर्ष की कहानी नहीं है। यह उस शिक्षक की कहानी है, जिसने अपने अनुभव को बच्चों की शिक्षा का माध्यम बना दिया। उन्होंने कठिन विषयों को किताबों के लंबे व्याख्यान में बदलने के बजाय गीत, कविता और नाटक का रूप दे दिया। उनके लिए कक्षा ऐसी जगह है, जहां बच्चे सुनते ही नहीं, बल्कि खुद हिस्सा लेकर सीखते हैं।

ब्लैकआउट एडवाइजरी से लेकर ग्रीष्म लहर से बचाव जैसे विषयों पर उन्होंने नाटक तैयार किए। बच्चों ने इन नाटकों में हिस्सा लिया और गंभीर विषयों को सहज तरीके से समझा। इसके बाद उन्होंने सीखी हुई बातों को दूसरों तक भी पहुंचाया। लाल सिंह के अनुसार, गीत और नाटक जैसी गतिविधियां विषय को बच्चों के दिमाग में लंबे समय तक बनाए रखने में मदद करती हैं।

लाल सिंह ने जुलाई 2021 में ददिउरी विद्यालय में नियुक्ति के बाद 1000 से अधिक वीडियो बनाए हैं। वह अपने लेक्चर और गतिविधियों को वीडियो के रूप में सोशल मीडिया पर साझा करते हैं ताकि उनका ज्ञान सिर्फ उनकी कक्षा तक सीमित न रहे। उनका मानना है कि शिक्षक का ज्ञान ज्यादा से ज्यादा बच्चों तक पहुंचना चाहिए। उनके वीडियो बेसिक शिक्षा विभाग की ओर से प्रदेश स्तर पर भी साझा किए जा रहे हैं।

उनकी शिक्षण शैली का सीधा असर बच्चों की उपस्थिति पर पड़ा है। खंड शिक्षा अधिकारी नवीन कुमार के अनुसार, लाल सिंह के आने के बाद स्कूल की उपस्थिति 90-95 फीसदी तक पहुंच गई है। बच्चों को गीत और कविता के जरिए पढ़ाई आसान और मजेदार लगती है, जबकि नाटक कठिन विषयों को समझने में मदद करते हैं।

लाल सिंह की कहानी की सबसे बड़ी ताकत यह है कि उन्होंने अपनी शारीरिक चुनौती को अपनी पहचान की सीमा नहीं बनने दिया। उन्होंने उसे पीछे छोड़कर शिक्षा को अपना मिशन बनाया। जिस शिक्षक ने खुद कठिन परिस्थितियों में शिक्षा हासिल की, वह अब कोशिश कर रहा है कि कोई बच्चा शिक्षा से वंचित न रहे।

उनके लिए स्कूल सिर्फ नौकरी की जगह नहीं है। यह वह जगह है जहां वह बच्चों को सीखने का आनंद देते हैं, अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका देते हैं और ज्ञान को कक्षा की चारदीवारी से निकालकर समाज तक पहुंचाते हैं। शिक्षक दिवस पर लाल सिंह की कहानी यही संदेश देती है कि शिक्षक की असली ताकत उसके संसाधनों में नहीं, बल्कि उसकी सोच और समर्पण में होती है।


अटन कुमार शुक्ला, महोली देहात प्राथमिक विद्यालय, सीतापुर  
अटन कुमार शुक्ला, महोली देहात प्राथमिक विद्यालय, सीतापुर   - फोटो : गांव जंक्शन

4- हाथ में कठपुतली, जुबान पर कहानी और कक्षा में खिलखिलाते बच्चे

अटन कुमार शुक्ला, महोली देहात प्राथमिक विद्यालय, सीतापुर  
सुबह आठ बजे स्कूल खुलने का समय करीब आते ही सीतापुर के महोली देहात प्राथमिक विद्यालय के बच्चे उत्साह से स्कूल पहुंचने की जिद करने लगते हैं। वजह कोई महंगी स्मार्ट क्लास नहीं, बल्कि हाथ में कठपुतली लेकर आने वाले उनके शिक्षक अटन कुमार शुक्ला हैं। बच्चे उन्हें प्यार से ‘कहानी वाले सर जी’ कहते हैं। अटन कुमार ने कठपुतली, कहानी, संवाद, अभिनय, गीत और कविता को पढ़ाई का हिस्सा बनाकर कक्षा को ऐसी जगह बना दिया है, जहां बच्चे सीखने के साथ-साथ लगातार जिज्ञासु भी बने रहते हैं।

अटन कुमार के लिए कठपुतली केवल मनोरंजन नहीं है। वह इसे बच्चों तक कठिन संदेश पहुंचाने का माध्यम मानते हैं। गणित, विज्ञान, नैतिक शिक्षा और सामाजिक व्यवहार जैसे विषयों को वह कहानी और संवाद के जरिए समझाते हैं। धूम्रपान जैसे विषय पर स्वस्थ और कमजोर दिखने वाली कठपुतली के माध्यम से उसके दुष्प्रभाव समझाना इसका उदाहरण है। बच्चे कठपुतली से सवाल-जवाब करते हैं और इस संवाद के जरिए विषय को याद रखने के बजाय समझने की कोशिश करते हैं।

कठपुतली से उनका रिश्ता बचपन से जुड़ा है। करीब 49 वर्षीय अटन कुमार ने बचपन में कठपुतली का शो देखा था और तभी इस कला के जरिए कुछ नया करने का संकल्प लिया। करीब 17 वर्ष पहले वह बेसिक शिक्षा विभाग में प्राथमिक शिक्षक बने। वर्ष 2018 में जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान की कार्यशाला में उन्होंने कठपुतली बनाना सीखा और फिर इसे शिक्षण का हिस्सा बना दिया।

उनकी कक्षा में सिर्फ कठपुतली ही नहीं बोलती। कई बार अचानक गीत शुरू हो जाता है, कभी वाद्य यंत्रों का इस्तेमाल होता है और कभी कविता कक्षा का माहौल बदल देती है। गणित के जोड़-घटाव जैसे विषय भी छोटी-छोटी कहानियों में बदल जाते हैं। बच्चों के लिए पढ़ाई किताब और ब्लैकबोर्ड से आगे बढ़कर एक अनुभव बन जाती है।

अटन कुमार की खासियत उनकी आवाजों की कला भी है। वह करीब 25 तरह की आवाजें निकाल लेते हैं, जिनमें पशु-पक्षियों, बच्चों, महिलाओं, बुजुर्गों और कार्टून पात्रों की आवाजें शामिल हैं। इससे कठपुतलियां बच्चों के सामने और ज्यादा जीवंत हो जाती हैं।

एक कठपुतली तैयार करने में भी करीब सात दिन लगते हैं। अखबार के टुकड़ों को भिगोकर लुगदी तैयार की जाती है, उसे पीसकर मेथी मिलाई जाती है, फिर चेहरे का सांचा बनाकर उस पर लुगदी लगाई जाती है। सूखने के बाद रंगाई-पुताई और कपड़ों से उसे नया रूप दिया जाता है। इस काम में उनकी पत्नी आकांक्षा शुक्ला भी सहयोग करती हैं।

इस प्रयोग का असर स्कूल के माहौल पर दिखाई देता है। अभिभावकों का भरोसा बढ़ा है और बच्चों को स्कूल आना अच्छा लगने लगा है। एक अभिभावक के अनुसार, कठपुतली के जरिए पढ़ाई बच्चों को खेल जैसी लगती है। कक्षा चार की रिया के लिए स्कूल आने का मतलब है कि हर दिन कुछ नया सीखने को मिलेगा।

हालांकि स्कूल के सामने चुनौतियां भी हैं। अधिकांश परिवार खेती, रंगाई-पुताई और दिहाड़ी मजदूरी से जुड़े हैं और इसी वजह से औसत उपस्थिति करीब 75 प्रतिशत रहती है। शिक्षक और विद्यालय स्टाफ बच्चों को स्कूल से जोड़ने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं।
 
आशीष प्रताप सिंह, प्राथमिक विद्यालय दौतरा, रायबरेली
आशीष प्रताप सिंह, प्राथमिक विद्यालय दौतरा, रायबरेली - फोटो : गांव जंक्शन

5- क्यूआर कोड से एआर-वीआर तक, गांव के स्कूल में बच्चों को मिल रही नई दुनिया

आशीष प्रताप सिंह, प्राथमिक विद्यालय दौतरा, रायबरेली
रायबरेली के दौतरा गांव का प्राथमिक विद्यालय कभी ऐसी स्थिति में था कि परिसर में जानवर बांधे जाते थे और स्कूल की अपनी बाउंड्री तक नहीं थी। आज उसी विद्यालय में स्मार्ट क्लास है, एआर-वीआर डिवाइस हैं, सैकड़ों किताबों वाली लाइब्रेरी है और बच्चे पेड़-पौधों के बारे में क्यूआर कोड स्कैन करके जानकारी हासिल करते हैं। इस बदलाव के केंद्र में हैं विद्यालय के प्रभारी प्रधानाध्यापक आशीष प्रताप सिंह।

ग्रामीण सरकारी विद्यालयों की सबसे बड़ी चुनौतियों में बच्चों को स्कूल तक लाना और उन्हें विद्यालय में बनाए रखना शामिल है। आशीष प्रताप सिंह ने इस समस्या को अलग नजरिए से देखा। उनका मानना था कि अगर स्कूल बच्चों के लिए आनंदमय जगह बन जाए तो उन्हें विद्यालय आने के लिए अलग से मनाने की जरूरत कम हो जाएगी। इसी सोच ने स्कूल में तकनीक आधारित कई प्रयोगों की शुरुआत की।

विद्यालय में पेड़-पौधों से लेकर वॉल पेंटिंग तक अलग-अलग जगहों पर क्यूआर कोड लगाए गए हैं। बच्चों को दो टैबलेट की मदद से इन कोड को स्कैन करने का मौका मिलता है। उदाहरण के लिए, स्कूल परिसर में मौजूद 50 से अधिक पेड़ों के बारे में बच्चे क्यूआर कोड स्कैन करके वीडियो के जरिए जानकारी हासिल कर सकते हैं। इस तरह उनके लिए आसपास का वातावरण ही सीखने की किताब बन गया है।

लेकिन इस बदलाव की कहानी केवल तकनीक तक सीमित नहीं है। स्कूल की बुनियादी स्थिति सुधारने में ग्रामीणों और अभिभावकों की भी बड़ी भूमिका रही। जब स्कूल में बाउंड्री नहीं थी, तब ग्रामीणों ने एक-एक बांस सहयोग के रूप में दिया। बाद में ग्राम प्रधान की मदद से दो साल में पक्की बाउंड्री तैयार हुई। अब वही ग्रामीण विद्यालय की सुरक्षा में प्रहरी की भूमिका निभाते हैं। स्कूल की लाइब्रेरी में 600 से अधिक किताबें हैं, जिन्हें तैयार करने में अभिभावकों, ग्रामीणों, विभाग और दूसरे शिक्षकों ने सहयोग किया।

विद्यालय में एआर-वीआर डिवाइस और स्मार्ट क्लास ने पढ़ाई के अनुभव को और बदल दिया। बच्चों की उपस्थिति, जो कभी 20-30 फीसदी के आसपास रहती थी, अब 97-98 फीसदी तक पहुंच गई है। आशीष के लिए यह सबसे बड़ा प्रमाण है कि जब बच्चों को स्कूल में सीखने के साथ आनंद मिलता है तो वे खुद विद्यालय आने लगते हैं।

स्कूल की पारदर्शिता बढ़ाने के लिए वेबसाइट बनाई गई है और रोजाना विद्यालय की गतिविधियों की जानकारी और तस्वीरें वाट्सऐप के माध्यम से साझा की जाती हैं। सहायक अध्यापक संजीव कुमार बाजपेयी के अनुसार, एआर-वीआर बच्चों की कल्पनाशक्ति को विकसित करने में मदद करता है और ऐसी चीजें समझने में सहायक है, जिन्हें बच्चों ने वास्तविक जीवन में शायद कभी देखा ही न हो।


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