रविकांत द्विवेदी, प्राथमिक विद्यालय भगेसर, मिर्जापुर
मिर्जापुर के प्राथमिक विद्यालय भगेसर की कहानी किसी बदलाव की रिपोर्ट से कम नहीं है। कभी विद्यालय की रैंकिंग 95वें स्थान पर थी, लेकिन प्रधानाध्यापक रविकांत द्विवेदी की मेहनत और सामुदायिक सहयोग ने इसकी तस्वीर बदल दी। आज विद्यालय की रैंकिंग पांचवें स्थान तक पहुंच चुकी है और यहां पढ़ने वाले बच्चे स्कूल बंक नहीं करना चाहते। शिक्षक दिवस के मौके पर रविकांत की कहानी इसलिए खास है क्योंकि उन्होंने स्कूल की बेहतरी को सिर्फ अपनी जिम्मेदारी नहीं माना, बल्कि पूरे समुदाय को उससे जोड़ दिया।
किसी सरकारी स्कूल को बदलना सिर्फ शिक्षक के प्रयास से संभव नहीं होता। उसके लिए अभिभावकों और ग्रामीणों का भरोसा भी जरूरी होता है। रविकांत द्विवेदी ने इसी भरोसे को विद्यालय की ताकत बनाया। उन्होंने समुदाय को स्कूल की गतिविधियों से जोड़ा और संसाधनों की कमी को सामूहिक सहयोग से पूरा करने की कोशिश की।
आज भगेसर प्राथमिक विद्यालय में बच्चों के लिए हर कक्षा में एलईडी टीवी और कूलर जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं। पढ़ाई को रोचक बनाने के लिए नवीन तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। विद्यालय में खेलकूद की गतिविधियां भी होती हैं, ताकि बच्चों का विकास सिर्फ किताबों तक सीमित न रहे।
विद्यालय की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक बच्चों की स्कूल के प्रति बदलती रुचि है। यहां बच्चे अनुपस्थित रहना या स्कूल बंक करना नहीं चाहते। यह बदलाव किसी एक दिन में नहीं आया। इसके पीछे लगातार किए गए प्रयास, बेहतर वातावरण और बच्चों को सीखने के लिए प्रेरित करने वाली गतिविधियां हैं।
रविकांत की पहल का असर बच्चों की उपलब्धियों में भी दिखाई देता है। विद्यालय के बच्चों का चयन नवोदय विद्यालय के लिए भी हुआ है। इसका अर्थ है कि सरकारी स्कूल के बच्चे भी सही वातावरण और मार्गदर्शन मिलने पर आगे बढ़ने के अवसर हासिल कर सकते हैं।
रविकांत द्विवेदी को वर्ष 2021 में राज्य अध्यापक पुरस्कार मिल चुका है। अब शिक्षक दिवस के अवसर पर उन्हें राष्ट्रपति सम्मान मिलने की बात इस कहानी को और महत्वपूर्ण बनाती है। लेकिन उनके काम की असली पहचान पुरस्कार से आगे है- वह बच्चों का बदला हुआ रवैया और स्कूल की बदली हुई तस्वीर है। उनका मॉडल इस बात का उदाहरण है कि सरकारी स्कूल सिर्फ सरकारी व्यवस्था के भरोसे नहीं चलते। जब शिक्षक समुदाय को साथ लेकर चलता है तो विद्यालय के संसाधन भी बढ़ते हैं और अभिभावकों का भरोसा भी मजबूत होता है।
लाल सिंह, ददिउरी प्राथमिक विद्यालय, शाहजहांपुर
दो साल की उम्र में पोलियो ने लाल सिंह की शारीरिक क्षमता को प्रभावित किया, लेकिन शिक्षा के प्रति उनका जुनून कभी कमजोर नहीं पड़ा। पिता उन्हें डॉक्टर बनाना चाहते थे, लेकिन गांव में विज्ञान शिक्षक और संसाधनों की कमी के कारण वह सपना पूरा नहीं हो सका। इसके बावजूद लाल सिंह ने हार नहीं मानी। घुटनों के बल स्कूल जाते हुए उन्होंने बीएड, एमए इंग्लिश और नेट की योग्यता हासिल की। आज शाहजहांपुर के ददिउरी प्राथमिक विद्यालय में सहायक अध्यापक के रूप में वह गीत, कविता और नाटक के जरिए बच्चों को पढ़ा रहे हैं।
लाल सिंह की कहानी सिर्फ संघर्ष की कहानी नहीं है। यह उस शिक्षक की कहानी है, जिसने अपने अनुभव को बच्चों की शिक्षा का माध्यम बना दिया। उन्होंने कठिन विषयों को किताबों के लंबे व्याख्यान में बदलने के बजाय गीत, कविता और नाटक का रूप दे दिया। उनके लिए कक्षा ऐसी जगह है, जहां बच्चे सुनते ही नहीं, बल्कि खुद हिस्सा लेकर सीखते हैं।
ब्लैकआउट एडवाइजरी से लेकर ग्रीष्म लहर से बचाव जैसे विषयों पर उन्होंने नाटक तैयार किए। बच्चों ने इन नाटकों में हिस्सा लिया और गंभीर विषयों को सहज तरीके से समझा। इसके बाद उन्होंने सीखी हुई बातों को दूसरों तक भी पहुंचाया। लाल सिंह के अनुसार, गीत और नाटक जैसी गतिविधियां विषय को बच्चों के दिमाग में लंबे समय तक बनाए रखने में मदद करती हैं।
लाल सिंह ने जुलाई 2021 में ददिउरी विद्यालय में नियुक्ति के बाद 1000 से अधिक वीडियो बनाए हैं। वह अपने लेक्चर और गतिविधियों को वीडियो के रूप में सोशल मीडिया पर साझा करते हैं ताकि उनका ज्ञान सिर्फ उनकी कक्षा तक सीमित न रहे। उनका मानना है कि शिक्षक का ज्ञान ज्यादा से ज्यादा बच्चों तक पहुंचना चाहिए। उनके वीडियो बेसिक शिक्षा विभाग की ओर से प्रदेश स्तर पर भी साझा किए जा रहे हैं।
उनकी शिक्षण शैली का सीधा असर बच्चों की उपस्थिति पर पड़ा है। खंड शिक्षा अधिकारी नवीन कुमार के अनुसार, लाल सिंह के आने के बाद स्कूल की उपस्थिति 90-95 फीसदी तक पहुंच गई है। बच्चों को गीत और कविता के जरिए पढ़ाई आसान और मजेदार लगती है, जबकि नाटक कठिन विषयों को समझने में मदद करते हैं।
लाल सिंह की कहानी की सबसे बड़ी ताकत यह है कि उन्होंने अपनी शारीरिक चुनौती को अपनी पहचान की सीमा नहीं बनने दिया। उन्होंने उसे पीछे छोड़कर शिक्षा को अपना मिशन बनाया। जिस शिक्षक ने खुद कठिन परिस्थितियों में शिक्षा हासिल की, वह अब कोशिश कर रहा है कि कोई बच्चा शिक्षा से वंचित न रहे।
उनके लिए स्कूल सिर्फ नौकरी की जगह नहीं है। यह वह जगह है जहां वह बच्चों को सीखने का आनंद देते हैं, अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका देते हैं और ज्ञान को कक्षा की चारदीवारी से निकालकर समाज तक पहुंचाते हैं। शिक्षक दिवस पर लाल सिंह की कहानी यही संदेश देती है कि शिक्षक की असली ताकत उसके संसाधनों में नहीं, बल्कि उसकी सोच और समर्पण में होती है।
आशीष प्रताप सिंह, प्राथमिक विद्यालय दौतरा, रायबरेली
रायबरेली के दौतरा गांव का प्राथमिक विद्यालय कभी ऐसी स्थिति में था कि परिसर में जानवर बांधे जाते थे और स्कूल की अपनी बाउंड्री तक नहीं थी। आज उसी विद्यालय में स्मार्ट क्लास है, एआर-वीआर डिवाइस हैं, सैकड़ों किताबों वाली लाइब्रेरी है और बच्चे पेड़-पौधों के बारे में क्यूआर कोड स्कैन करके जानकारी हासिल करते हैं। इस बदलाव के केंद्र में हैं विद्यालय के प्रभारी प्रधानाध्यापक आशीष प्रताप सिंह।
ग्रामीण सरकारी विद्यालयों की सबसे बड़ी चुनौतियों में बच्चों को स्कूल तक लाना और उन्हें विद्यालय में बनाए रखना शामिल है। आशीष प्रताप सिंह ने इस समस्या को अलग नजरिए से देखा। उनका मानना था कि अगर स्कूल बच्चों के लिए आनंदमय जगह बन जाए तो उन्हें विद्यालय आने के लिए अलग से मनाने की जरूरत कम हो जाएगी। इसी सोच ने स्कूल में तकनीक आधारित कई प्रयोगों की शुरुआत की।
विद्यालय में पेड़-पौधों से लेकर वॉल पेंटिंग तक अलग-अलग जगहों पर क्यूआर कोड लगाए गए हैं। बच्चों को दो टैबलेट की मदद से इन कोड को स्कैन करने का मौका मिलता है। उदाहरण के लिए, स्कूल परिसर में मौजूद 50 से अधिक पेड़ों के बारे में बच्चे क्यूआर कोड स्कैन करके वीडियो के जरिए जानकारी हासिल कर सकते हैं। इस तरह उनके लिए आसपास का वातावरण ही सीखने की किताब बन गया है।
लेकिन इस बदलाव की कहानी केवल तकनीक तक सीमित नहीं है। स्कूल की बुनियादी स्थिति सुधारने में ग्रामीणों और अभिभावकों की भी बड़ी भूमिका रही। जब स्कूल में बाउंड्री नहीं थी, तब ग्रामीणों ने एक-एक बांस सहयोग के रूप में दिया। बाद में ग्राम प्रधान की मदद से दो साल में पक्की बाउंड्री तैयार हुई। अब वही ग्रामीण विद्यालय की सुरक्षा में प्रहरी की भूमिका निभाते हैं। स्कूल की लाइब्रेरी में 600 से अधिक किताबें हैं, जिन्हें तैयार करने में अभिभावकों, ग्रामीणों, विभाग और दूसरे शिक्षकों ने सहयोग किया।
विद्यालय में एआर-वीआर डिवाइस और स्मार्ट क्लास ने पढ़ाई के अनुभव को और बदल दिया। बच्चों की उपस्थिति, जो कभी 20-30 फीसदी के आसपास रहती थी, अब 97-98 फीसदी तक पहुंच गई है। आशीष के लिए यह सबसे बड़ा प्रमाण है कि जब बच्चों को स्कूल में सीखने के साथ आनंद मिलता है तो वे खुद विद्यालय आने लगते हैं।
स्कूल की पारदर्शिता बढ़ाने के लिए वेबसाइट बनाई गई है और रोजाना विद्यालय की गतिविधियों की जानकारी और तस्वीरें वाट्सऐप के माध्यम से साझा की जाती हैं। सहायक अध्यापक संजीव कुमार बाजपेयी के अनुसार, एआर-वीआर बच्चों की कल्पनाशक्ति को विकसित करने में मदद करता है और ऐसी चीजें समझने में सहायक है, जिन्हें बच्चों ने वास्तविक जीवन में शायद कभी देखा ही न हो।