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Home› Shikshak Junction› Ganesh Tableau In Latur Village Turns Into A Grassroots Campaign For Better Government Schools

गणेशोत्सव में ग्रामीण शिक्षा की मुहिम: लातूर के गांव में गणपति की झांकी से उठी सरकारी स्कूलों को बदलने की आवाज

गांव जंक्शन डेस्क, लातूर Published by: Umashankar Mishra Updated Sat, 19 Sep 2026 01:45 PM IST
सार

महाराष्ट्र के लातूर जिले की औसा तहसील के उजनी गांव के रहने वाले 31 वर्षीय सूरज धवन ने अपने घर की गणेश झांकी को गांव के सरकारी स्कूल की बेहतरी की मुहिम में बदल दिया है।

लातूर के 31 वर्षीय सूरज धवन ने अपने घर की गणेश झांकी को गांव के सरकारी स्कूल की बेहतरी की मुहिम में बदल दिया है।
लातूर के 31 वर्षीय सूरज धवन ने अपने घर की गणेश झांकी को गांव के सरकारी स्कूल की बेहतरी की मुहिम में बदल दिया है। - फोटो : AI Image (सांकेतिक तस्वीर)
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विस्तार
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गणेशोत्सव की रौनक में जहां ज्यादातर घरों में गणपति बप्पा की सजावट परंपरा और उत्सव तक सीमित रहती है, वहीं महाराष्ट्र के लातूर जिले के एक गांव में इसी उत्सव ने एक बड़े सामाजिक सवाल को आवाज दी है।

लातूर जिले की औसा तहसील के उजनी गांव के रहने वाले 31 वर्षीय सूरज धवन ने अपने घर की गणेश झांकी को गांव के सरकारी स्कूल की बेहतरी की मुहिम में बदल दिया है।

सरकारी स्कूलों की हकीकत का आईना बनी झांकी 
सूरज ने बताया कि उनकी यह झांकी कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के 'स्कूल ठीक करो अभियान' से प्रेरित है, जो सरकारी स्कूलों के बुनियादी ढांचे, पढ़ाई के माहौल और छात्रों को मिलने वाली सुविधाओं जैसी जमीनी हकीकत को सामने लाने का काम कर रहा है। 

उन्होंने बताया कि यह अभियान असल में उजनी जिला परिषद स्कूल से ही शुरू हुआ था, जब पिछले महीने पार्टी के संयोजक अभिजीत दीपके ने इस स्कूल का दौरा किया था — यानी गांव का यह स्कूल पहले से ही इस मुहिम के केंद्र में रहा है।

जब गौरी माता निभा रहीं शिक्षिका की भूमिका
पेशे से उद्यमी सूरज ने इस बार अपनी झांकी में कुछ अलग ही रचनात्मकता दिखाई। उन्होंने गौरी माता को एक शिक्षिका के रूप में दर्शाया है, जो बच्चों को पढ़ा रही हैं और उनके इर्द-गिर्द वे तमाम सुविधाएं दिखाई गई हैं, जिन्हें एक सुरक्षित और सहयोगी स्कूली माहौल के लिए जरूरी माना जाता है।

इस झांकी में उन्होंने शौचालय, लाइब्रेरी, कला विभाग, डिजिटल स्मार्ट रूम और स्मार्ट बोर्ड जैसी चीजें शामिल कीं — यानी एक आदर्श सरकारी स्कूल कैसा दिखना चाहिए, इसकी पूरी झलक इस एक झांकी में समेट दी गई।

गांवों में सरकारी स्कूल ही हैं सबसे बड़ा सहारा
सूरज ने यह भी रेखांकित किया कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के बच्चों के लिए सरकारी स्कूलों की अहमियत कितनी ज्यादा है। खासतौर पर किसानों, मजदूरों और अन्य वंचित समुदायों के बच्चों के लिए, जो अपने विकास के लिए पूरी तरह इन्हीं सरकारी संस्थानों पर निर्भर रहते हैं।

सूरज कहते हैं, ऐसे में जब गांव-देहात की यह बड़ी आबादी सिर्फ सरकारी स्कूलों के भरोसे अपने बच्चों का भविष्य गढ़ती है, तो इन स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं में सुधार सीधे तौर पर ग्रामीण विकास से जुड़ जाता है।

उत्सव से उपजी एक जमीनी मुहिम
सूरज की यह पहल दिखाती है कि गांव के लोग अपनी परंपराओं का इस्तेमाल कर किस तरह स्थानीय मुद्दों को सामने ला सकते हैं। गणेशोत्सव जैसा त्योहार, जो आमतौर पर श्रद्धा और उत्सव का प्रतीक होता है।

इस बार उजनी गांव में शिक्षा और ग्रामीण बुनियादी ढांचे को लेकर एक सार्थक संवाद का जरिया बन गया और यही असल मायने में गांव को भीतर से मजबूत बनाने की दिशा में एक छोटी मगर अहम कोशिश है।
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