एक तरफ साल 2026 के कमजोर मानसून ने प्रमुख खरीफ फसलों की बुवाई पर खराब असर डाला है, तो दूसरी तरफ कम बारिश ने खरीफ उत्पादन को लेकर बाजार में चिंता को जन्म दिया है। इस उतार-चढ़ाव का असर आगामी महीनों में रसोई खर्च पर देखने को मिल सकता है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, धान और मक्का जैसी प्रमुख फसलों के रकबे में गिरावट आई है, जबकि रकबे के नजरिए से दलहन-तिलहन और मोटे अनाजों के मोर्चे पर राहत की खबर है।
धान, मक्का और सोयाबीन की बुआई में गिरावट
कृषि मंत्रालय के जारी आंकड़ों के मुताबिक, इस बार धान के रकबे में सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। धान का रकबा 438.19 लाख हेक्टेयर से घटकर 421.82 लाख हेक्टेयर रह गया है। रकबे में गिरावट के अलावा कम बारिश से चावल के कुल उत्पादन पर असर पड़ना तय माना जा रहा है। इसके अलावा, मक्का का रकबा भी 94.08 लाख हेक्टेयर से घटकर 91.09 लाख हेक्टेयर हो गया है, यानी इसमें 2.99 लाख हेक्टेयर की कमी आई है। मक्का का इस्तेमाल सिर्फ खाने में ही नहीं, बल्कि पशु चारे में भी बड़े पैमाने पर होता है। ऐसे में देश में मक्के की उपलब्धता कम होने पर इसके दाम बढ़ सकते हैं। वहीं, सोयाबीन का रकबा भी 122.98 लाख हेक्टेयर से घटकर 121.82 लाख हेक्टेयर रह गया है, जिसमें 1.16 लाख हेक्टेयर की गिरावट आई है।
दालों और मोटे अनाज से मिली राहत
दलहन-तिलहन और मोटे अनाजों के मोर्चे पर बाजार के नजरिए से राहत की खबर है। कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, उड़द की बुआई 11.9 प्रतिशत बढ़कर 22.46 लाख हेक्टेयर से 25.15 लाख हेक्टेयर हो गई है। तुअर (अरहर) का रकबा भी 44.93 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 45.66 लाख हेक्टेयर पर पहुंच गया है। इसके साथ ही, मोटे अनाज बाजरा का क्षेत्र 62.87 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 64.86 लाख हेक्टेयर हो गया है। बुआई में 1.99 लाख हेक्टेयर की इस बढ़ोतरी से देश में मोटे अनाजों की उपलब्धता काफी मजबूत होगी।
हल्दी के दामों में भारी उछाल, स्टॉक हुआ कम
फसलों की बुआई के अलावा, मसालों के बाजार में हल्दी की कीमतों में जबरदस्त उबाल देखा जा रहा है। एनसीडीईएक्स पर हल्दी के दाम बढ़कर 21,400 रुपये प्रति क्विंटल के करीब पहुंच गए हैं। पिछले एक साल में ही हल्दी की कीमतों में 42 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़ोतरी हो चुकी है।
केडिया एडवाइजरी की रिपोर्ट के मुताबिक, इस सीजन की शुरुआत में हल्दी का शुरुआती स्टॉक करीब 26.5 लाख बोरी था। साल 2025-26 के दौरान कुल उत्पादन लगभग 90 लाख बोरी रहने का अनुमान लगाया गया था। इसमें से 32 लाख बोरी हल्दी का निर्यात हो गया और 69.5 लाख बोरी की खपत देश के अंदर ही हो गई। इसके कारण सीजन के अंत में बचा हुआ स्टॉक घटकर सिर्फ 15 लाख बोरी रह गया है। स्टॉक में आई इसी भारी कमी के कारण हल्दी की कीमतों में यह तेजी आई है।