सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष अंशू मल्लिक के अनुसार, 1 नवंबर से शुरू हो रहे 2026/27 के मार्केटिंग साल में भारत में सूरजमुखी तेल का आयात 30 प्रतिशत बढ़कर 35 लाख मीट्रिक टन तक पहुंचने की संभावना है। आयात शुल्क (कस्टम ड्यूटी) में कटौती के कारण कीमतें कम हुई हैं, जिससे बाजार में इसकी मांग काफी बढ़ गई है।
ड्यूटी घटने से आम लोगों के लिए सस्ता हुआ तेल
पिछले सप्ताह ही भारत सरकार ने कच्चे सूरजमुखी तेल पर लगने वाले बेसिक आयात शुल्क को 10 प्रतिशत से घटाकर शून्य (जीरो) कर दिया है। 'ग्लोबोइल सम्मेलन' के दौरान मल्लिक ने कहा कि इस कटौती की वजह से सूरजमुखी तेल अब उपभोक्ताओं के लिए ज्यादा सस्ता हो गया है और इससे इसकी खपत बढ़ने की उम्मीद है।
उन्होंने बताया कि सूरजमुखी तेल का आयात बढ़ने के कारण, अगले मार्केटिंग साल में सोयाबीन तेल की खरीद 10.7 प्रतिशत घटकर 50 लाख (5 मिलियन) टन रह जाने का अनुमान है।
पाम ऑयल की कीमतों पर 'अल नीनो' का साया
मल्लिक के अनुसार, नए साल में पाम ऑयल (ताड़ का तेल) का आयात लगभग 80 लाख (8 मिलियन) टन पर स्थिर रहने की संभावना है। हालांकि, 'अल नीनो' मौसम चक्र के कारण सप्लाई प्रभावित होने की आशंका है, जिससे पाम ऑयल की कीमतें बढ़ सकती हैं।
वहीं, इंडोनेशियाई पाम ऑयल एसोसिएशन के चेयरमैन एडी मार्टोनो ने मंगलवार को बताया कि अल नीनो के कारण उत्पादन को खतरा है। इसके साथ ही सबसे बड़े निर्यातक देश इंडोनेशिया में बायोडीजल की मांग बढ़ने से भी पाम ऑयल की सप्लाई कम हो रही है। इस कारण 2027 में पाम ऑयल की कीमत सोयाबीन तेल से भी ज्यादा हो सकती है।
कम बारिश से सरसों की फसल पर असर, बढ़ सकता है कुल आयात
भारत अपनी खाद्य तेल की कुल जरूरत का लगभग दो-तिहाई हिस्सा आयात से पूरा करता है। मुख्य रूप से मलेशिया, इंडोनेशिया, अर्जेंटीना, रूस और यूक्रेन से पाम ऑयल, सोयाबीन तेल और सूरजमुखी तेल मंगाया जाता है।
अंशू मल्लिक के अनुसार, 2026/27 में भारत का कुल वनस्पति तेल आयात 1.65 करोड़ से 1.7 करोड़ (16.5 से 17 मिलियन) टन के बीच स्थिर रहने की उम्मीद है। लेकिन, अगर कम बारिश की वजह से देश में सरसों की फसल प्रभावित होती है, तो यह आयात 10 लाख (1 मिलियन) टन तक और बढ़ सकता है।
सरसों भारत में सर्दियों में बोई जाने वाली मुख्य तिलहन फसल है, जिसमें लगभग 40 प्रतिशत तक तेल होता है। देश में खाद्य तेल की सप्लाई तय करने में सरसों की बड़ी भूमिका है। चिंता की बात यह है कि देश के कुल सरसों उत्पादन का लगभग आधा हिस्सा उगाने वाले राज्य राजस्थान में इस बार जून-सितंबर के मानसून सीजन के दौरान औसत से 22 प्रतिशत कम बारिश हुई है।