जलवायु परिवर्तन से निपटने में जुटे हिमाचल के गांव: खेती में बदलाव से लेकर आपदा प्रबंधन तक हो रही पहल
गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली
Published by: Mohammad Aamil
Updated Sat, 31 Oct 2026 05:23 PM IST
सार
हिमाचल प्रदेश के गांव जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए नई फसलें, प्राकृतिक खेती और जल संरक्षण के तरीके अपना रहे हैं। अध्ययन में 12 पंचायतों से 25 अनुकूलन उपाय सामने आए।
हिमाचल प्रदेश के गांवों में जलवायु परिवर्तन के असर से निपटने के लिए स्थानीय स्तर पर कई प्रयास किए जा रहे हैं। कहीं किसान पारंपरिक फसलों की जगह नई फसलें अपना रहे हैं, तो कहीं पुराने जल स्रोतों को फिर से जीवित किया जा रहा है। कुछ गांवों में आपदाओं से बचाव की तैयारी भी शुरू हो गई है। काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर (सीईईडब्ल्यू) के एक अध्ययन में ये प्रयास सामने आए हैं। यह अध्ययन इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (इसीमोड) के सहयोग से किया गया।
अध्ययन में मंडी, कुल्लू, सिरमौर और शिमला जिलों की 12 ग्राम पंचायतों को शामिल किया गया। सीईईडब्ल्यू ने एक विशेष अध्ययन पद्धति के जरिए जलवायु परिवर्तन से निपटने के 25 उपायों की पहचान की है। रिपोर्ट के अनुसार, इन उपायों को 30 से अधिक सरकारी नीतियों और योजनाओं से मदद मिल सकती है। रिपोर्ट शनिवार को हिमाचल प्रदेश प्रशासनिक सेवा के अतिरिक्त सचिव निशांत ठाकुर ने जारी की। इस मौके पर इसीमोड की डॉ. अमीना महर्जन और राजीव अहल भी मौजूद रहे।
कहीं प्राकृतिक खेती, तो कहीं नई फसलों पर जोर
अध्ययन में गांवों के कई ऐसे उदाहरण सामने आए हैं, जहां लोग बदलते मौसम के हिसाब से खेती और जल संरक्षण के तरीके अपना रहे हैं। शिमला जिले के संधू गांव में 20 से अधिक परिवार प्राकृतिक खेती करने लगे हैं। कुल्लू के बजौरा में किसानों ने सेब के बजाय जापानी फल की खेती शुरू की है। वहीं, सिरमौर के परारा गांव में किसान सेब के साथ लहसुन भी उगा रहे हैं। सिरमौर के थाना कशोगा में महिला समूहों ने 35 में से पांच बावड़ियों को फिर से उपयोग लायक बनाया है। इससे स्थानीय जल स्रोतों को बचाने की कोशिश की जा रही है।
आपदा से बचाव की तैयारी कर रहे ग्रामीण
शिमला जिले की शोघी पंचायत में वर्ष 2023 में हुए भूस्खलन के बाद ग्राम आपदा प्रबंधन समिति बनाई गई। यह राज्य की पहली ग्राम आपदा प्रबंधन समिति है। इसके तहत ग्रामीणों को प्राथमिक उपचार और आपदा के समय सुरक्षित स्थान पर पहुंचने का प्रशिक्षण दिया गया है।
हिमाचल प्रदेश राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एचपीएसडीएमए) ने भी वर्ष 2026 में 'आपदा रक्षक योजना' शुरू की है। अध्ययन में सुझाव दिया गया है कि पंचायत स्तर पर आपदा प्रबंधन समितियों को प्रशिक्षण दिया जाए, ताकि गांव के लोग आपात स्थिति में तेजी से कदम उठा सकें।
आपदा से 20 हजार करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान
रिपोर्ट जारी करते हुए निशांत ठाकुर ने कहा कि हाल की आपदाओं से हिमाचल प्रदेश को 20 हजार करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हुआ है। उन्होंने कहा कि आपदा आने के बाद राहत और बचाव के साथ-साथ पहले से तैयारी करना भी जरूरी है।
सीईईडब्ल्यू की श्रेया वधावन ने कहा कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए स्थानीय स्तर पर काम करने वाले लोगों और सरकारी सहायता के बीच तालमेल जरूरी है। वहीं, इसीमोड की डॉ. अमीना महर्जन ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के असर से निपटने के उपायों की शुरुआत गांवों और वहां रहने वाले लोगों से हो सकती है।
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