दुनिया के जंगलों पर दबाव लगातार बढ़ रहा है। जंगल जितनी तेजी से खराब हो रहे हैं, उतनी तेजी से उनकी बहाली नहीं हो पा रही है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) की ‘द स्टेट ऑफ द वर्ल्ड्स फॉरेस्ट्स 2026’ रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया में 46 करोड़ हेक्टेयर से ज्यादा वन क्षेत्र खराब हो चुका है।
रिपोर्ट के अनुसार, जलवायु परिवर्तन, बढ़ती आबादी, शहरीकरण और बुनियादी ढांचे का विस्तार जंगलों के क्षरण के प्रमुख कारण हैं। इसके अलावा भूमि उपयोग में बदलाव, ऊर्जा और संसाधनों की बढ़ती मांग तथा आजीविका के लिए जमीन पर लोगों की निर्भरता भी जंगलों पर दबाव बढ़ा रही है।
2030 के लक्ष्य और मौजूदा काम में बड़ा अंतर
रिपोर्ट में जंगलों के साथ-साथ खराब हो चुकी भूमि और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को फिर से बहाल करने पर जोर दिया गया है। भूमि क्षरण का मतलब किसी पारिस्थितिकी तंत्र से मिलने वाली वस्तुओं और सेवाओं में लंबे समय तक होने वाली गिरावट से है। इसमें जैव विविधता, पानी, भूमि की उत्पादकता और लोगों से जुड़ी सामाजिक-आर्थिक सेवाएं भी शामिल हैं।
कुनमिंग-मॉन्ट्रियल ग्लोबल बायोडायवर्सिटी फ्रेमवर्क (KMGBF) के तहत 2030 तक खराब हो चुके पारिस्थितिकी तंत्र के 30 फीसदी हिस्से को बहाल करने का लक्ष्य है। इसके लिए करीब 46.9 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र को प्रभावी ढंग से बहाल करना जरूरी होगा। हालांकि, 2026 तक देशों की राष्ट्रीय रिपोर्टों में करीब 20.65 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र ही बहाली के तहत दर्ज किया गया है। इससे वैश्विक लक्ष्य और जमीन पर चल रहे काम के बीच बड़ा अंतर सामने आता है।
1990 से 32.4 करोड़ हेक्टेयर प्राकृतिक वन घटे
रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया के करीब 92 फीसदी वन क्षेत्र प्राकृतिक रूप से विकसित होने वाले जंगलों का है। 1990 से 2025 के बीच इन प्राकृतिक जंगलों का क्षेत्रफल 32.4 करोड़ हेक्टेयर घट गया। यह जंगलों की लगातार बढ़ती संवेदनशीलता को दिखाता है।
प्राकृतिक जंगल जैव विविधता, पानी, मिट्टी और कार्बन भंडारण के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। इनके घटने से जंगलों की पारिस्थितिकी पर असर पड़ता है। वर्ष 2025 में दुनिया का कुल वन क्षेत्र करीब 4.14 अरब हेक्टेयर था, जो कुल वैश्विक भूमि क्षेत्र का लगभग 32 फीसदी है।
48.9 करोड़ हेक्टेयर वन क्षेत्र खत्म हुआ
वनों की कटाई और वन क्षरण दुनिया के सामने बड़ी पर्यावरणीय चुनौती बने हुए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, 1990 से अब तक दुनियाभर में करीब 48.9 करोड़ हेक्टेयर वन क्षेत्र वनों की कटाई के कारण खत्म हुआ।
इसमें प्राथमिक जंगल भी बड़े स्तर पर प्रभावित हुए हैं। ये ऐसे प्राकृतिक जंगल हैं, जहां जैव विविधता और पारिस्थितिकी का महत्व काफी अधिक होता है। 1990 से 2025 के बीच दुनिया के प्राथमिक वन क्षेत्र में करीब 11 करोड़ हेक्टेयर की कमी आई। वन क्षेत्र घटने से कई प्रजातियों के आवास खत्म या छोटे हिस्सों में बंट जाते हैं। इससे जैव विविधता के साथ पानी, मिट्टी, कार्बन भंडारण और दूसरी प्राकृतिक सेवाओं पर भी असर पड़ता है।
वन हानि की रफ्तार पहले घटी, फिर बढ़ी
रिपोर्ट के अनुसार, दुनियाभर में शुद्ध वन हानि की रफ्तार लंबे समय में कम हुई है, लेकिन हाल के वर्षों में इसमें फिर बढ़ोतरी देखी गई। 1990-2000 के दौरान हर साल औसतन 1.07 करोड़ हेक्टेयर वन क्षेत्र कम हुआ। 2000-2015 के दौरान यह घटकर 36.8 लाख हेक्टेयर प्रति वर्ष रह गया।
लेकिन 2015-2025 में शुद्ध वन हानि फिर बढ़कर 41.2 लाख हेक्टेयर प्रति वर्ष हो गई। रिपोर्ट के अनुसार, इसकी प्रमुख वजह नए वन क्षेत्र के बढ़ने की रफ्तार में कमी रही।
चीन और कनाडा में भी घटा वन विस्तार
रिपोर्ट में चीन और कनाडा का उदाहरण देते हुए बताया गया है कि वहां भी वन क्षेत्र बढ़ने की रफ्तार कम हुई है। चीन में 2000-2015 के दौरान हर साल औसतन 22.2 लाख हेक्टेयर वन क्षेत्र बढ़ा। 2015-2025 में यह बढ़ोतरी घटकर 16.9 लाख हेक्टेयर प्रति वर्ष रह गई। कनाडा में वन क्षेत्र बढ़ने की दर 5.13 लाख हेक्टेयर से घटकर 82,500 हेक्टेयर प्रति वर्ष रह गई।
अमेरिका में भी स्थिति बदली। 2000-2015 के दौरान वहां हर साल औसतन 4.37 लाख हेक्टेयर वन क्षेत्र बढ़ा था, लेकिन 2015-2025 में हर साल करीब 1.2 लाख हेक्टेयर वन क्षेत्र कम हुआ।
अफ्रीका में 33.4 करोड़ हेक्टेयर भूमि खराब
रिपोर्ट में अलग-अलग महाद्वीपों में भूमि क्षरण की स्थिति भी बताई गई है। अफ्रीका में 2019 में करीब 12 फीसदी भूमि, यानी लगभग 33.4 करोड़ हेक्टेयर, खराब मानी गई। एशिया में स्थिति और बड़ी है। यहां करीब 19 फीसदी भूमि, यानी लगभग 58.3 करोड़ हेक्टेयर, क्षरित बताई गई। इसके पीछे भूमि उपयोग में बदलाव, खेती का विस्तार और वन क्षरण का संयुक्त प्रभाव बताया गया है। दक्षिण अमेरिका में करीब 14 फीसदी भूमि, यानी लगभग 24.5 करोड़ हेक्टेयर, खराब भूमि के रूप में दर्ज की गई।
93 देशों में बहाली की जरूरत
2026 की रिपोर्ट के लिए किए गए अतिरिक्त विश्लेषण में 93 देशों और क्षेत्रों की पहचान की गई, जहां जंगलों और भूमि की बहाली की जरूरत है। कई देशों ने खराब जंगलों की पहचान उनकी मौजूदा स्थिति के आधार पर की है। इनमें ‘खराब वन’ और ‘खराब भूमि’ जैसी श्रेणियां शामिल हैं। कई क्षेत्रों में जंगल की आग, जले हुए जंगल और वनाग्नि से प्रभावित क्षेत्र भी बहाली की जरूरत वाले क्षेत्रों में शामिल किए गए हैं।
इसके अलावा जंगलों में पेड़ों की संख्या या वन क्षेत्र की संरचना में कमी को भी क्षरण का संकेत माना गया है। अस्थायी तरीके से लकड़ी निकालना, खराब वन प्रबंधन और जंगल की जमीन को दूसरे कामों में बदलना भी इसके प्रमुख कारण हैं।
मिट्टी कटाव और जरूरत से ज्यादा चराई भी वजह
कई देशों ने मिट्टी के कटाव, जरूरत से ज्यादा पशु चराई और भूमि क्षरण को भी जंगलों की खराब स्थिति से जोड़ा है। कई जगहों पर समस्या केवल जंगल तक सीमित नहीं है। कटाव वाली जमीन, आर्द्रभूमि, मैंग्रोव, खाली जमीन और खेती के क्षेत्र भी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
इससे पता चलता है कि जंगलों को बचाने के लिए केवल पेड़ लगाना पर्याप्त नहीं होगा। पूरे भू-दृश्य यानी जंगल, खेती, पानी, मिट्टी और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को एक साथ ध्यान में रखकर काम करना होगा।
अब बहाली के काम को तेज करना होगा
FAO की रिपोर्ट के मुताबिक, संयुक्त राष्ट्र के वन और भूमि बहाली दशक के अंतिम वर्षों में वैश्विक बहाली के लक्ष्यों और जमीन पर चल रहे काम के बीच अंतर कम करने का समय तेजी से निकल रहा है। रिपोर्ट में अलग-अलग और छोटे प्रयासों के बजाय समन्वित और बड़े स्तर पर गुणवत्तापूर्ण बहाली कार्यक्रम चलाने की जरूरत बताई गई है। इसके लिए तीन प्रमुख क्षेत्रों पर जोर दिया गया है- ज्ञान प्रणाली, मानक एवं क्षमता निर्माण और निगरानी के साथ लगातार सीखने की व्यवस्था।
रिपोर्ट का संदेश साफ है कि जंगलों की बहाली केवल नए पौधे लगाने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। इसके लिए स्थानीय परिस्थितियों, मिट्टी, पानी, जैव विविधता और स्थानीय समुदायों को ध्यान में रखते हुए लंबे समय तक काम करना होगा। तभी जंगलों और खराब हो चुकी भूमि को दोबारा स्वस्थ बनाया जा सकेगा।
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