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Home› Khabar Junction› Cocoa Demand In The Country Stands At 1 1 Lakh Tonnes While Production Is Only 30 000 Tonnes Experts Have Of

देश में कोको की मांग 1.1 लाख टन : उत्पादन सिर्फ 30 हजार टन, विशेषज्ञों ने दिए उत्पादन बढ़ाने से जुड़े सुझाव...

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Devesh Saraswat Updated Tue, 06 Oct 2026 05:45 PM IST
सार

  • देश में कोको की मांग और उत्पादन के बीच बड़ा अंतर है।
  • मौजूदा मांग करीब 1.1 लाख टन है, जबकि उत्पादन लगभग 30 हजार टन ही हो रहा है।
  • बढ़ती घरेलू और अंतरराष्ट्रीय मांग को देखते हुए देश में कोको की खेती का रकबा बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।
  • विशेषज्ञों ने 2040 तक देश में कोको का उत्पादन बढ़ाकर 2 लाख टन करने का लक्ष्य रखने की जरूरत बताई है।
  • कोको की पैदावार बढ़ाने के लिए अच्छी गुणवत्ता वाले पौधों और रोपण सामग्री के इस्तेमाल के साथ किसानों को प्रशिक्षण देने पर जोर दिया गया है।

कोको की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए किसानों तक अच्छी पौध और रोपण सामग्री पहुंचाना अहम।
कोको की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए किसानों तक अच्छी पौध और रोपण सामग्री पहुंचाना अहम। - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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आने वाले सालों में कोको की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए देश में इसकी खेती का रकबा बढ़ाने की सख्त जरूरत है। इसके लिए किसानों को अच्छी गुणवत्ता वाले पौधों और रोपण सामग्री का इस्तेमाल करना होगा। यह बात दक्षिण कन्नड़ जिले के विट्टल स्थित केंद्रीय रोपण फसल अनुसंधान संस्थान के क्षेत्रीय स्टेशन में आयोजित एक बैठक में कृषि विशेषज्ञों ने कही। सोमवार को हुई इस विचार-मंथन बैठक का मुख्य विषय 'आत्मनिर्भर कोको क्षेत्र: 2047 के लिए रोडमैप' था।

उत्पादन और मांग के बीच का बड़ा अंतर
सीपीसीआरआई के निदेशक के.बी. हेब्बार के अनुसार, वर्तमान में भारत के भीतर कोको की मांग लगभग 1.1 लाख टन है, जबकि देश का कुल उत्पादन केवल 30,000 टन के आसपास ही है। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी इसकी मांग तेजी से बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि भारत के पास पर्याप्त खेती योग्य जमीन है, इसलिए अच्छी गुणवत्ता वाली रोपण सामग्री का उपयोग करके इस जमीन पर कोको की खेती की संभावनाएं तलाशी जानी चाहिए। हालांकि, उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि खेती का विस्तार करते समय गुणवत्ता, प्रमाणन और फसल की सही पहचान पर पूरा ध्यान दिया जाना चाहिए।

इस दौरान सीपीसीआरआई के पूर्व निदेशक पी. चोवडप्पा ने अलग-अलग देशों में कोको की खपत के आंकड़े पेश किए। उनके अनुसार, भारत में प्रति व्यक्ति कोको की खपत लगभग 1 किलोग्राम है। वहीं, स्विट्जरलैंड में यह 11.56 किलो, अमेरिका में 9.2 किलो, जर्मनी में 5.4 किलो और ब्रिटेन में 3 किलो है। उन्होंने बताया कि कुछ साल पहले दुनिया के प्रमुख कोको उत्पादक क्षेत्रों में बीमारियों का प्रकोप हुआ था, जिससे वैश्विक आपूर्ति प्रभावित हुई थी।

भारत में उत्पादन की बात करें तो चोवडप्पा के मुताबिक, देश का लगभग 40 प्रतिशत कोको केवल आंध्र प्रदेश में पैदा होता है। आंध्र प्रदेश सरकार भी इसका रकबा बढ़ाने पर ध्यान दे रही है और इसी कड़ी में एलुरु जिले में एक 'कोको सिटी' विकसित करने की योजना शुरू की गई है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि 2040 तक देश में कोको का उत्पादन 2 लाख टन तक ले जाने की जरूरत है, जिसके लिए अच्छी गुणवत्ता वाले पौधों की उपलब्धता प्राथमिकता होनी चाहिए।

भारतीय कोको के लिए विदेशी बाजारों में बड़ा अवसर
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के बागवानी विज्ञान के पूर्व उप महानिदेशक एन.के. कृष्ण कुमार के अनुसार, आंध्र प्रदेश के पूर्वी और पश्चिमी गोदावरी क्षेत्रों में उगाया जाने वाला कोको गुणवत्ता में सूडान के कोको के बिल्कुल बराबर है। यूरोपीय बाजार में सूडान के कोको की काफी अच्छी मांग है। उन्होंने कहा कि अफ्रीका में कोको की आपूर्ति फिलहाल डगमगाई हुई है, ऐसे में भारत के लिए यह बिल्कुल सही समय है कि वह घरेलू और अंतरराष्ट्रीय मांग को पूरा करने के लिए कोको की खेती में निवेश करे। इसके अलावा, अब पूर्वोत्तर राज्यों में भी कोको की खेती शुरू होने के अच्छे संकेत मिल रहे हैं।

पैदावार बढ़ाने के लिए नई तकनीक और प्रशिक्षण
काजू और कोको विकास निदेशालय की निदेशक फेमिना ने इस कार्यक्रम में ऑनलाइन जुड़कर अपनी बात रखी। उनके अनुसार, अच्छी गुणवत्ता वाले पौधों की उपलब्धता बढ़ाना बहुत जरूरी है। साथ ही, उन क्षेत्रों की व्यवस्थित रूप से पहचान की जानी चाहिए जो कोको की खेती के लिए सबसे उपयुक्त हैं। उन्होंने किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए प्रति हेक्टेयर फसल की पैदावार को लगभग 800 किलोग्राम से बढ़ाकर 1,500 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तक ले जाने का सुझाव दिया।
बेंगलुरु स्थित आईसीएआर-अटारी (कृषि प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान) के निदेशक एम. प्रभाकर ने कहा कि कोको की खेती का दायरा बढ़ाने में कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) बहुत अहम भूमिका निभा सकते हैं। उन्होंने कहा कि जिस तरह आंध्र प्रदेश में कोको के रकबे में भारी वृद्धि देखी गई है, उसी तरह कृषि विज्ञान केंद्रों की मदद से अन्य कोको उत्पादक राज्यों की कमियों को भी दूर किया जा सकता है। बैठक में ऑनलाइन शामिल हुए आईसीएआर के सहायक महानिदेशक (रोपण फसलें) वी.बी. पटेल ने कहा कि खेती के विस्तार के लिए अच्छी रोपण सामग्री समय की सबसे बड़ी मांग है। उन्होंने सुझाव दिया कि सीपीसीआरआई को कोको की नर्सरी तैयार करने के सही और बेहतर तरीकों पर एक नियमावली (मैनुअल) तैयार करनी चाहिए।
 
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