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Bikaner Scientists Receive Patent For Boosting Bioactive Potential Of Camel Milk Protein Hydrolysate
बीकानेर वेटरनरी विश्वविद्यालय की उपलब्धि: वैज्ञानिकों ने ऊंटनी के दूध पर बनाई नई तकनीक, सरकार से मिला पेटेंट
गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली
Published by: Umashankar Mishra
Updated Sat, 26 Sep 2026 07:56 PM IST
सार
बीकानेर के पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान महाविद्यालय के वैज्ञानिकों को ऊंटनी के दूध में प्रोटीन हाइड्रोलाइजेट की जैव-सक्रिय क्षमता बढ़ाने वाली तकनीक पर भारत सरकार से पेटेंट मिला है। इस उपलब्धि से भविष्य में ऊंटनी के दूध पर आधारित नए उत्पादों के विकास और पश्चिमी राजस्थान के पशुपालकों को लाभ मिलने की संभावना है।
वैज्ञानिकों की टीम ने ऊंटनी के दूध में मौजूद प्रोटीन हाइड्रोलाइजेट के कार्यात्मक गुणों और जैव-सक्रिय क्षमता को बढ़ाने वाली विशेष तकनीक विकसित की है।
- फोटो : गांव जंक्शन
बीकानेर स्थित पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान महाविद्यालय के वैज्ञानिकों को भारत सरकार के पेटेंट कार्यालय से एक बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि मिली है। वैज्ञानिकों की टीम ने ऊंटनी के दूध में मौजूद प्रोटीन हाइड्रोलाइजेट के कार्यात्मक गुणों और जैव-सक्रिय क्षमता को बढ़ाने वाली विशेष तकनीक विकसित की है, जिसे अब औपचारिक रूप से पेटेंट प्रदान किया गया है। इस उपलब्धि से आने वाले समय में ऊंटनी के दूध पर आधारित उत्पादों और पशुपालकों के लिए नए अवसर खुलने की उम्मीद जताई जा रही है।
चार वैज्ञानिकों की टीम ने की खोज
वेटरनरी विश्वविद्यालय के कुलगुरु डॉ. सुमंत व्यास के अनुसार, इस शोध को डॉ. अनीता तंवर, डॉ. आर. के. बेरवाल, डॉ. योगेश कुमार और डॉ. अनिल हर्ष की टीम ने मिलकर पूरा किया। टीम ने ऊंटनी के दूध से प्राप्त प्रोटीन हाइड्रोलाइजेट की कार्यात्मक विशेषताओं का गहराई से अध्ययन कर इसकी जैव-सक्रिय क्षमता बढ़ाने वाली नई तकनीक तैयार की।
क्या है प्रोटीन हाइड्रोलाइजेट
दूध में प्राकृतिक रूप से मौजूद प्रोटीन को वैज्ञानिक प्रक्रियाओं के जरिये छोटे पेप्टाइड्स में विभाजित करने से प्रोटीन हाइड्रोलाइजेट प्राप्त होता है। इन सूक्ष्म पेप्टाइड घटकों में मूल प्रोटीन से अलग कार्यात्मक और जैव-सक्रिय गुण पाए जाते हैं, जिन्हें अधिक प्रभावी बनाना ही इस शोध का मुख्य उद्देश्य रहा।
पश्चिमी राजस्थान के पशुपालकों को होगा फायदा
बीकानेर सहित पश्चिमी राजस्थान में ऊंटपालन की पुरानी परंपरा रही है, जहां ऊंट ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पशुपालकों की आजीविका का अहम हिस्सा हैं। ऊंटनी के दूध के पोषक व जैव-सक्रिय घटकों पर हुए इस अध्ययन को दुग्ध क्षेत्र और पशुपालकों के लिए लाभदायक माना जा रहा है।
भविष्य में बनेंगे नए उत्पाद
यह तकनीक भविष्य में ऊंटनी के दूध से जुड़े कार्यात्मक खाद्य पदार्थों और पोषण आधारित उत्पादों के निर्माण में सहायक होगी। हालांकि किसी भी उत्पाद के व्यावसायिक निर्माण या स्वास्थ्य उपयोग से पहले जरूरी वैज्ञानिक परीक्षण और नियामकीय प्रक्रियाएं पूरी करनी होंगी। कुलगुरु डॉ. व्यास ने टीम के प्रयासों की सराहना करते हुए उम्मीद जताई कि यह पेटेंट ऊंट आधारित वैज्ञानिक गतिविधियों को बढ़ावा देगा।
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