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97 लाख टन मीथेन छोड़ते हैं धान के खेत : वैज्ञानिकों ने बताया 30-50% तक कमी का तरीका, जानें

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Mon, 21 Sep 2026 12:51 PM IST
सार

  • भारत के धान के खेतों से हर साल करीब 97 लाख टन मीथेन उत्सर्जन होने का अध्ययन में अनुमान है।
  • देश के करीब 4 करोड़ हेक्टेयर धान क्षेत्र में लंबे समय तक पानी भरा रहने से मीथेन बनने की प्रक्रिया होती है।
  • अध्ययन के अनुसार, कुल चावल मीथेन उत्सर्जन में करीब 75% हिस्सेदारी खरीफ धान की है।
  • तापमान बढ़ने और बारिश के पैटर्न में बदलाव जारी रहने पर सदी के मध्य तक उत्सर्जन 25% बढ़ने का अनुमान है।

धान की सीधी बुवाई
धान की सीधी बुवाई - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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भारत में धान की खेती सिर्फ खाद्यान्न उत्पादन के लिए ही नहीं, बल्कि मीथेन गैस के उत्सर्जन के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। एक नए अध्ययन के मुताबिक, देश के धान के खेत हर साल करीब 97 लाख टन मीथेन उत्सर्जित करते हैं। तापमान बढ़ने और बारिश के पैटर्न में बदलाव जारी रहा तो आने वाले वर्षों में यह उत्सर्जन और बढ़ सकता है।

पानी भरे खेतों से कैसे निकलती है मीथेन?
धान की खेती में लंबे समय तक खेतों में पानी भरा रहता है। पानी के नीचे मिट्टी में ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है। ऐसी स्थिति में कुछ सूक्ष्मजीव मिट्टी और पौधों के जैविक पदार्थ को तोड़ते हैं। इस प्रक्रिया के दौरान मीथेन गैस बनती है, जो वातावरण में पहुंचती है। भारत में करीब चार करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में धान की खेती होती है। इतने बड़े क्षेत्र में लंबे समय तक पानी भरे रहने के कारण मीथेन का उत्सर्जन लगातार होता रहता है।

खरीफ धान की हिस्सेदारी करीब 75 फीसदी
भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (IISER), भोपाल और इंटरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट (IRRI) के वैज्ञानिकों के अध्ययन में मीथेन उत्सर्जन से जुड़ी यह जानकारी सामने आई है। अध्ययन की प्रमुख शोधकर्ता धन्यलक्ष्मी पिल्लई के अनुसार, भारत में चावल की खेती से होने वाले कुल मीथेन उत्सर्जन में करीब 75 फीसदी हिस्सेदारी खरीफ धान की है। खरीफ सीजन में धान की खेती बड़े क्षेत्र में होती है और इस दौरान बारिश तथा खेतों में पानी की उपलब्धता भी मीथेन बनने की प्रक्रिया को प्रभावित करती है।

तापमान और बारिश में बदलाव से बढ़ सकता है उत्सर्जन
शोधकर्ताओं ने मौसम में होने वाले बदलाव को लेकर भी चिंता जताई है। अध्ययन के अनुसार, अगर तापमान बढ़ता रहा और बारिश का पैटर्न अधिक अनियमित होता गया, तो सदी के मध्य तक धान से होने वाला मीथेन उत्सर्जन मौजूदा स्तर से करीब 25 फीसदी बढ़ सकता है। इसका मतलब है कि भविष्य में धान की खेती में ऐसी तकनीकों की जरूरत और बढ़ेगी, जिनसे किसानों की पैदावार प्रभावित किए बिना खेतों से होने वाले मीथेन उत्सर्जन को कम किया जा सके।

खेतों को कुछ समय सुखाने से कम हो सकती है मीथेन
शोधकर्ताओं ने मीथेन उत्सर्जन कम करने के लिए अल्टरनेट वेटिंग एंड ड्राइंग (AWD) तकनीक को महत्वपूर्ण बताया है। इसमें धान के खेत को पूरे समय पानी से भरा रखने के बजाय सिंचाई के बीच कुछ समय के लिए खेत को सूखने दिया जाता है और फिर जरूरत के अनुसार दोबारा पानी दिया जाता है। अध्ययन के मुताबिक, इस तरह खेत में पानी भरने और सुखाने का क्रम अपनाने से मीथेन उत्सर्जन करीब 30 से 50 फीसदी तक कम किया जा सकता है।

किसानों के लिए क्यों जरूरी है यह तकनीक?
धान की खेती में पानी का सही प्रबंधन फसल और पर्यावरण दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। खेत को जरूरत से ज्यादा समय तक पानी में डुबोकर रखने के बजाय सिंचाई का अंतर और मिट्टी की स्थिति देखकर पानी देना मीथेन उत्सर्जन कम करने में मदद कर सकता है। हालांकि, AWD तकनीक अपनाने से पहले किसान अपने क्षेत्र की मिट्टी, मौसम, धान की किस्म और सिंचाई व्यवस्था को ध्यान में रखें।

स्थानीय कृषि विशेषज्ञ या कृषि विज्ञान केंद्र की सलाह के अनुसार पानी प्रबंधन करना अधिक सुरक्षित रहेगा। अध्ययन का मुख्य संदेश यह है कि धान की खेती में पानी प्रबंधन में बदलाव करके मीथेन उत्सर्जन को काफी हद तक कम करने की संभावना है।
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