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Nagaland Study Calls For Location Specific Strategies For Sustainable Pineapple Farming
नागालैंड में हुए अध्ययन में खुलासा: अनानास की टिकाऊ खेती के लिए हर जिले के लिए अलग रणनीति जरूरी
गांव जंक्शन डेस्क, कोहिमा
Published by: Umashankar Mishra
Updated Mon, 21 Sep 2026 01:49 PM IST
सार
नागालैंड यूनिवर्सिटी के अध्ययन में अनानास की टिकाऊ खेती के लिए जिला-विशिष्ट रणनीति, बेहतर कृषि सलाह, संसाधन संरक्षण और किसानों के प्रशिक्षण को मजबूत करने पर जोर दिया गया है। जानिए, विस्तार से...
शोधकर्ताओं के अनुसार किसानों को खेती के तरीकों के लंबे समय तक पड़ने वाले पर्यावरणीय और आर्थिक असर के बारे में जागरूक करना भी जरूरी है।
- फोटो : गांव जंक्शन
नागालैंड यूनिवर्सिटी के एक अध्ययन में अनानास किसानों के बीच टिकाऊ खेती की तकनीकों को बढ़ावा देने के लिए स्थानीय जरूरतों के हिसाब से कृषि सलाह और प्रशिक्षण देने पर जोर दिया गया है। अध्ययन के मुताबिक किसानों तक तकनीकी जानकारी, कृषि विस्तार सेवाओं और संस्थागत मदद की बेहतर पहुंच बनाना जरूरी है। साथ ही, बागवानी विकास से जुड़ी मौजूदा योजनाओं में टिकाऊ खेती को भी शामिल करने की जरूरत है।
अध्ययन में यह भी कहा गया है कि अलग-अलग जिलों में किसानों की जरूरत और खेती की परिस्थितियां अलग हो सकती हैं। इसलिए पूरे राज्य में एक जैसी रणनीति अपनाने के बजाय जिले और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार कृषि योजनाएं तैयार करना ज्यादा उपयोगी हो सकता है।
सभी जिलों में होती है अनानास की खेती
नागालैंड के सभी जिलों में अनानास की खेती होती है। राज्य का अनानास अपने खास स्वाद, मिठास, कम रेशे और अधिक कुल घुलनशील ठोस पदार्थ यानी टीएसएस के लिए जाना जाता है। इसमें टीएसएस की मात्रा 16.5 से 18 प्रतिशत तक बताई गई है।
अनानास किसानों के लिए यह फसल आमदनी और आजीविका का महत्वपूर्ण जरिया है। हालांकि, किसानों को उत्पादन, बाजार, फसल कटाई के बाद प्रबंधन और प्राकृतिक संसाधनों को लंबे समय तक बचाए रखने जैसी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
शोधकर्ताओं ने अनानास की खेती में अंतरवर्ती खेती, मिश्रित खेती, जैविक पोषक तत्व प्रबंधन को बताया अहम।
- फोटो : गांव जंक्शन
नागालैंड यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रो. जगदीश के. पटनायक ने कहा कि अध्ययन से नागालैंड में टिकाऊ अनानास खेती को बढ़ावा देने के लिए जरूरी कारकों की जानकारी मिलती है। उन्होंने स्थानीय जरूरतों के हिसाब से रणनीति बनाने, कृषि विस्तार सेवाओं को मजबूत करने और संसाधनों के बेहतर संरक्षण पर जोर दिया।
चार पहलुओं पर हुआ अध्ययन
अध्ययन में अनानास किसानों के बीच टिकाऊ कृषि तकनीकों को अपनाने की स्थिति को चार प्रमुख क्षेत्रों में देखा गया। इनमें खेती की तकनीक, संसाधन प्रबंधन, कीट एवं रोग प्रबंधन और फसल कटाई के बाद का प्रबंधन शामिल हैं।
शोधकर्ताओं ने अलग-अलग जिलों में इन तकनीकों को अपनाने के स्तर में अंतर का भी अध्ययन किया। इसके साथ ही यह समझने की कोशिश की गई कि किसान टिकाऊ खेती की तकनीकों को अपनाने का फैसला किन परिस्थितियों में करते हैं।
यह अध्ययन Indian Journal of Extension Education में प्रकाशित किया गया है। यह कृषि विस्तार, ग्रामीण विकास और किसानों से जुड़े विषयों पर शोध प्रकाशित करने वाली पीयर-रिव्यू और स्कोपस इंडेक्स्ड पत्रिका है। शोध को नागालैंड यूनिवर्सिटी के कृषि विस्तार शिक्षा विभाग की सेंटिबेनला पोंगेनर, प्रो. कौशल कुमार झा और डॉ. शागोलसेम हेरोजित सिंह ने मिलकर किया है।
नागालैंड की अनानास उत्पादक (दाएं) से बात करते हुए शोधकर्ता (बाएं)।
- फोटो : गांव जंक्शन
एक जैसा तरीका हर जिले के लिए कारगर नहीं
अध्ययन से जुड़े प्रो. कौशल कुमार झा के मुताबिक अनानास की टिकाऊ खेती को सिर्फ उत्पादन, लागत, बाजार और कटाई के बाद के प्रबंधन तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। खेती के अलग-अलग चरणों में अपनाई जाने वाली टिकाऊ तकनीकों और जिलों के बीच के अंतर को भी समझना जरूरी है। उनके अनुसार, किसानों की परिस्थितियां स्थानीय स्तर पर अलग होने के कारण कृषि विस्तार की रणनीति भी उसी हिसाब से तैयार होनी चाहिए। इससे किसानों के लिए प्रशिक्षण और तकनीकी सलाह को ज्यादा उपयोगी बनाया जा सकता है।
जमीन, आमदनी और कृषि सलाह का असर
अध्ययन में टिकाऊ खेती की तकनीकों को अपनाने को प्रभावित करने वाले तीन प्रमुख पक्ष सामने आए। इनमें जमीन के इस्तेमाल और आमदनी से जुड़े कारक, किसानों की रुचि और प्रेरणा तथा कृषि विस्तार सेवाओं तक पहुंच शामिल हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार, सिर्फ नई तकनीक उपलब्ध करा देना पर्याप्त नहीं है। किसान की आर्थिक स्थिति, खेती को लेकर उसकी जागरूकता, रुचि और कृषि विशेषज्ञों से मिलने वाली सलाह भी यह तय करती है कि वह टिकाऊ तकनीकों को कितनी आसानी से अपनाएगा।
अनानास की सहफसली खेती।
- फोटो : गांव जंक्शन
मिट्टी और पानी बचाने वाली तकनीकों पर जोर
शोधकर्ताओं ने अनानास की खेती में अंतरवर्ती खेती, मिश्रित खेती, जैविक पोषक तत्व प्रबंधन, मिट्टी और पानी का संरक्षण, कृषि इनपुट का उचित इस्तेमाल और फसल अवशेषों के बेहतर प्रबंधन जैसी तकनीकों को बढ़ावा देने की जरूरत बताई है। इन तरीकों से मिट्टी की सेहत बनाए रखने, पानी और दूसरे संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करने और लंबे समय में अनानास आधारित खेती को अधिक टिकाऊ बनाने में मदद मिल सकती है।
जलवायु बदलाव के दौर में जागरूकता जरूरी
पीएचडी शोधार्थी सेंटिबेनला पोंगेनर के मुताबिक किसानों को खेती के तरीकों के लंबे समय तक पड़ने वाले पर्यावरणीय और आर्थिक असर के बारे में जागरूक करना भी जरूरी है। जलवायु परिवर्तन, मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट और पोषक तत्वों की कमी जैसी चुनौतियों को देखते हुए टिकाऊ खेती की जानकारी और प्रशिक्षण को मौजूदा कृषि योजनाओं का हिस्सा बनाया जा सकता है।
शोधकर्ताओं ने कृषि और बागवानी योजनाओं में जरूरत के हिसाब से प्रशिक्षण, खेतों पर प्रदर्शन, किसान से किसान तक जानकारी पहुंचाने, तकनीकी सलाह और नियमित फॉलोअप को मजबूत करने की सिफारिश की है।
शोधकर्ताओं के मुताबिक, जमीन तैयार करने और रोपाई से लेकर फसल प्रबंधन, कटाई और कटाई के बाद के प्रबंधन तक किसानों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार सलाह मिलनी चाहिए। इससे नागालैंड में अनानास की खेती को अधिक टिकाऊ और बदलती परिस्थितियों के लिए तैयार बनाने में मदद मिल सकती है।
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