तपती धरती, घटती मजदूरी: खेत मजदूर सबसे अधिक प्रभावित, भीषण गर्मी ने खेतिहर मजदूरों से छीने काम के 54 दिन
गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली
Published by: Umashankar Mishra
Updated Fri, 12 Jun 2026 02:29 PM IST
सार
वर्ष 2024 में भारत के कृषि श्रमिकों ने अत्यधिक गर्मी के कारण औसतन 648 कार्य घंटे यानी 54 कार्य दिवस गंवा दिए। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि आने वाले वर्षों में तापमान और बढ़ने से खेती, मजदूरी और खाद्य सुरक्षा पर बड़ा असर पड़ सकता है।
जलवायु संकट की मार झेल रहे किसान, गर्मी के चलते घटे काम के दिन।
- फोटो : AI
बढ़ती गर्मी अब सिर्फ फसलों के लिए ही नहीं, बल्कि खेतों में काम करने वाले मजदूरों के लिए भी बड़ी चुनौती बनती जा रही है। ब्रिटेन की संस्था एनर्जी एंड क्लाइमेट इंटेलिजेंस यूनिट की एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2024 में भारत के कृषि श्रमिकों ने भीषण गर्मी के कारण औसतन 648 घंटे काम नहीं कर पाए। यह लगभग 54 पूरे कार्य-दिवस के बराबर है।
रिपोर्ट के मुताबिक, जब तापमान बहुत अधिक बढ़ जाता है तो खेतों में लंबे समय तक काम करना खतरनाक हो जाता है। ऐसे में मजदूरों को काम के घंटे कम करने पड़ते हैं, बार-बार आराम करना पड़ता है या कई बार काम पूरी तरह रोकना पड़ता है। इसका सीधा असर उनकी आय पर पड़ता है।
अध्ययन में शामिल 15 देशों में भारत गर्मी के कारण कृषि श्रम हानि के मामले में तीसरे स्थान पर रहा। भारत से आगे केवल घाना और वियतनाम ही थे। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2024 में भारत के कृषि क्षेत्र में गर्मी की वजह से कुल 16.33 करोड़ कार्य घंटे नष्ट हुए, जो 2014 की तुलना में 45 प्रतिशत से अधिक वृद्धि है।
विशेषज्ञों का कहना है कि स्थिति और भी गंभीर हो सकती है। वैज्ञानिकों ने आशंका जताई है कि आने वाले वर्षों में एक शक्तिशाली अल नीनो विकसित हो सकता है, जिससे तापमान और बढ़ेगा। विश्व मौसम संगठन का अनुमान है कि वर्ष 2027 अब तक का सबसे गर्म वर्ष हो सकता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि बढ़ती गर्मी केवल मजदूरों की कमाई ही नहीं घटा रही, बल्कि खाद्य उत्पादन और खाद्य सुरक्षा के लिए भी खतरा बन रही है। भारत जैसे देशों में, जहां बड़ी आबादी खेती पर निर्भर है, खेतों में काम के घंटे कम होने से उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
दिल्ली स्थित सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट के अनुसार, वर्ष 2025 में लगभग पूरे साल देश के किसी न किसी हिस्से में चरम मौसम की घटनाएं दर्ज की गईं। इससे साफ है कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की नहीं, बल्कि वर्तमान की समस्या बन चुका है।
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