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State Of India S Environment 2026 Data Reveals Deepening Climate Water And Pollution Crisis
भारत के पर्यावरण पर चौंकाने वाली रिपोर्ट: 99% दिनों में चरम मौसम! हवा, पानी, वन और तापमान... हर मोर्चे पर संकट
गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली
Published by: Umashankar Mishra
Updated Fri, 05 Jun 2026 03:06 PM IST
सार
भारत में 2025 के दौरान 99 प्रतिशत दिनों में चरम मौसम की घटनाएं दर्ज हुईं। 4,421 लोगों की मौत हुई, 1.74 करोड़ हेक्टेयर फसल क्षेत्र प्रभावित हुआ, जंगलों का क्षरण बढ़ा, भूजल दोहन गंभीर स्तर पर पहुंचा और वायु प्रदूषण से होने वाली मौतों में भी वृद्धि दर्ज की गई। सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरमेंट (CSE) और डाउन टू अर्थ की ताजा रिपोर्ट में ये चौंकाने वाले खुलासे किए गए हैं।
भारत के पर्यावरण पर CSE और डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट के आंकड़े चिंता बढ़ाने वाले हैं।
- फोटो : AI
साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) और डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट के आंकड़े चिंता बढ़ाने वाले हैं। वर्ष 2025 में देश ने 99% दिनों में चरम मौसम की घटनाएं झेलीं। 4,421 लोगों की मौत हुई, 1.74 करोड़ हेक्टेयर फसल क्षेत्र प्रभावित हुआ और 97,000 हेक्टेयर वन भूमि गैर-वन उपयोगों के लिए मंजूर कर दी गई। दूसरी ओर भूजल तेजी से खत्म हो रहा है और वायु प्रदूषण से होने वाली मौतें बढ़ रही हैं।
ये सिर्फ आंकड़े नहीं हैं, बल्कि आने वाले वर्षों में भारत के सामने खड़ी पर्यावरणीय चुनौतियों की चेतावनी हैं।
99% दिनों में चरम मौसम की घटनाएं
सीएसई की State of India’s Environment 2026: In Figures रिपोर्ट में जलवायु, चरम मौसम, जंगल, जैव विविधता, जल संसाधन, वायु गुणवत्ता, कचरा प्रबंधन और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2025 में देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने चरम मौसम की घटनाओं का सामना किया। वर्ष के 99 प्रतिशत दिनों में कहीं न कहीं अत्यधिक बारिश, बाढ़, गर्मी, ओलावृष्टि या अन्य मौसमीय आपदाएं दर्ज की गईं। इन घटनाओं में 4,421 लोगों की जान गई और लगभग 1.74 करोड़ हेक्टेयर फसल क्षेत्र प्रभावित हुआ।
किसानों के लिए बढ़ रहा जोखिम
सीएसई की रिपोर्ट बताती है कि मानसून के साथ-साथ प्री-मानसून और पोस्ट-मानसून अवधि भी अब अधिक विनाशकारी बनती जा रही है। मार्च और अप्रैल भारतीय किसानों के लिए नए जोखिम वाले महीने बनकर उभरे हैं, जहां गर्मी, असामान्य वर्षा और ओलावृष्टि की घटनाएं बढ़ रही हैं। फरवरी 2026 में पहली बार देश में कहीं भी शीतलहर दर्ज नहीं हुई, जबकि हिमाचल प्रदेश में मार्च की शुरुआत में ही गंभीर हीटवेव का असर देखा गया।
जंगलों पर बढ़ता दबाव
वर्ष 2020-21 से 2024-25 के बीच लगभग 97,000 हेक्टेयर वन भूमि को गैर-वन उपयोगों के लिए मंजूरी दी गई। इस अवधि में 26 राज्यों में वन भूमि के विचलन (Forest Diversion) में वृद्धि दर्ज की गई। रिपोर्ट के अनुसार, हाथियों और बाघों के मानवों पर हमलों की घटनाओं में भी बढ़ोतरी हुई है। केवल 2025 के पहले छह महीनों में बाघों के हमलों में 40 लोगों की मौत हुई।
भूजल संकट गहराया
रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि दुनिया अब "ग्लोबल वाटर बैंकरप्सी" के दौर में प्रवेश कर चुकी है। भारत में अत्यधिक भूजल दोहन के कारण प्रमुख नदी डेल्टा तेजी से धंस रहे हैं। 15 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश भूजल के अत्यधिक दोहन की श्रेणी में हैं। पंजाब, राजस्थान और हरियाणा ऐसे राज्यों में शामिल हैं जहां भूजल निकासी पुनर्भरण से अधिक हो चुकी है।
स्वास्थ्य पर बढ़ता असर
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) के आंकड़ों के अनुसार लगभग 13 प्रतिशत भारतीय किसी न किसी बीमारी से प्रभावित हैं। रिपोर्ट बताती है कि पिछले तीन दशकों में बीमारी की शिकायत करने वाले लोगों का अनुपात दोगुना हो गया है। हृदय रोग अब भारत में स्वास्थ्य बोझ का सबसे बड़ा कारण बनते जा रहे हैं। 15 से 29 वर्ष आयु वर्ग में भी हृदय रोग चिंता का विषय बन रहे हैं।
वायु प्रदूषण से बढ़ती मौतें
भारत में वायु प्रदूषण का स्वास्थ्य पर प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। वैश्विक वायु प्रदूषण से होने वाली मौतों में भारत की हिस्सेदारी 2014 के 23.76 प्रतिशत से बढ़कर 2023 में 25.34 प्रतिशत हो गई।
रिपोर्ट के अनुसार, भारत में परिवेशी PM2.5 प्रदूषण से जुड़ी मौतों में पिछले एक दशक के दौरान 61 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। हालांकि स्वच्छ ईंधन के बढ़ते उपयोग से घरेलू वायु प्रदूषण से होने वाली मौतों में 22 प्रतिशत से अधिक की कमी आई है।
पर्यावरणीय अपराध और लंबित मामले
रिपोर्ट के मुताबिक 2024 में पर्यावरणीय अपराधों में कमी दर्ज हुई, लेकिन वर्ष के अंत तक 99,000 से अधिक पर्यावरण संबंधी मामले अदालतों में लंबित थे।
आंकड़ों से आगे कार्रवाई की जरूरत
रिपोर्ट की प्रस्तावना में सीएसई की महानिदेशक सुनीता नारायण ने कहा है कि जिन चीजों को मापा जाता है, उन्हीं पर प्रभावी कार्रवाई संभव हो पाती है। इसलिए पर्यावरणीय आंकड़ों का संग्रह और विश्लेषण नीतिगत फैसलों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
रिपोर्ट का निष्कर्ष यही है कि जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव के बीच भारत को अधिक टिकाऊ और लचीले विकास मॉडल की दिशा में तेजी से आगे बढ़ना होगा।
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