धान की खेती में मीथेन गैस का उत्सर्जन कम करने की दिशा में भारत ने एक अहम कदम उठाया है। कार्बन क्रेडिट मानक तय करने वाली संस्था वेरा (Verra) ने धान उत्पादन से जुड़े अपने एक तरीके के तहत पहली बार कार्बन क्रेडिट को मंजूरी दी है। यह परियोजना तेलंगाना में चल रही है। इसमें पानी और फसल प्रबंधन के बेहतर तरीकों को अपनाकर अब तक 2.10 लाख टन से अधिक कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी का दावा किया गया है।
खेतों में पानी भरकर रखने के बजाय अपनाई जा रही नई तकनीक
तेलंगाना में चल रही ‘कोर कार्बन सस्टेनेबल राइस प्रोडक्शंस 01’ परियोजना के तहत धान के खेतों में पानी के प्रबंधन का तरीका बदला गया है। इसमें खेतों को लगातार पानी से भरा रखने के बजाय कुछ समय के लिए सूखने दिया जाता है और फिर जरूरत के अनुसार सिंचाई की जाती है। इस तकनीक को अल्टरनेट वेटिंग एंड ड्राइंग (AWD) कहा जाता है। इस तरीके से मिट्टी में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ती है। इससे मीथेन बनाने वाले सूक्ष्मजीवों की गतिविधि कम होती है और गैस का उत्सर्जन घटाने में मदद मिलती है।
किसानों को प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता
परियोजना में किसानों को खेतों में पानी का स्तर मापने के लिए विशेष ट्यूब, प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता दी जाती है। इसके अलावा, कार्बन क्रेडिट बेचने से होने वाली कमाई में किसानों को भी हिस्सा मिलता है। इससे किसानों को खेती के बेहतर तरीकों को अपनाने के साथ अतिरिक्त आमदनी का अवसर मिल सकता है।
क्या होते हैं कार्बन क्रेडिट?
कार्बन क्रेडिट ऐसे प्रमाणपत्र होते हैं, जो तय मानकों के अनुसार ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी या उसे हटाने की एक निश्चित मात्रा को दर्शाते हैं। आम तौर पर एक कार्बन क्रेडिट एक टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर उत्सर्जन में कमी या हटाने के बराबर होता है। इन क्रेडिट को कार्बन बाजार में खरीदा-बेचा जा सकता है।
धान की खेती में खेतों को लंबे समय तक पानी से भरा रखने पर ऑक्सीजन की कमी वाली परिस्थितियां बनती हैं। इससे मीथेन पैदा करने वाले सूक्ष्मजीव सक्रिय होते हैं। इसलिए पानी के बेहतर प्रबंधन से इस गैस के उत्सर्जन को कम करने की संभावना है।
वेरा की VM0051 पद्धति के तहत मिली मंजूरी
इस परियोजना के कार्बन क्रेडिट वेरा की VM0051 पद्धति के तहत जारी किए गए हैं। यह पद्धति धान की खेती में बेहतर कृषि तरीकों से होने वाली उत्सर्जन में कमी का आकलन करने में मदद करती है।इसमें पानी के प्रबंधन के अलावा धान की बेहतर किस्मों और मीथेन को कम करने में मदद करने वाले बैक्टीरिया के इस्तेमाल जैसे उपाय भी शामिल हो सकते हैं।
दूसरे देशों में भी बढ़ सकती हैं ऐसी परियोजनाएं
इस पद्धति के तहत 13 अन्य परियोजनाएं भी विकास या सत्यापन की प्रक्रिया में हैं। ऐसे में तेलंगाना की परियोजना को मिली मंजूरी से दूसरे क्षेत्रों और देशों में भी बेहतर धान उत्पादन तकनीकों को बढ़ावा मिल सकता है। हालांकि, इन परियोजनाओं का विस्तार करते समय उत्सर्जन में कमी का सही आकलन करना और किसानों को वास्तविक आर्थिक लाभ पहुंचाना महत्वपूर्ण होगा।
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