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शहर की नौकरी के बजाय खेती पर भरोसा : युवा ने केले के पौधों संग रोपे आत्मनिर्भरता के सपने, खेत से सीधे बिक्री

राकेश गिरि, स्वतंत्र पत्रकार Published by: Devesh Saraswat Updated Sun, 18 Oct 2026 02:01 PM IST
सार

गांव की पगडंडियों से शहर की नौकरी की ओर भागते युवाओं के बीच बस्ती के प्रमोद कुमार चौधरी ने अपनी जमीन पर ही भविष्य बोने का फैसला किया। स्नातक की पढ़ाई के साथ शुरू हुई केले की खेती आज उनके लिए कमाई की नई राह बन रही है।
 

शहर में नौकरी के बजाय बस्ती के युवा ने केले के पौधों संग रोपे आत्मनिर्भरता के सपने
शहर में नौकरी के बजाय बस्ती के युवा ने केले के पौधों संग रोपे आत्मनिर्भरता के सपने - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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खेती को अक्सर मेहनत, मौसम की मार और अनिश्चित आमदनी से जोड़कर देखा जाता है। बदलते समय में बड़ी संख्या में युवा बेहतर रोजगार की तलाश में शहरों की ओर जा रहे हैं, पर कुछ ऐसे भी हैं जो गांव में रहकर अपनी जमीन को ही रोजगार का जरिया बना रहे हैं। बस्ती जिले के कप्तानगंज क्षेत्र के खजुरिया मिश्र गांव के 25 वर्षीय युवा किसान प्रमोद कुमार चौधरी ऐसे ही हैं। स्नातक की पढ़ाई के साथ उन्होंने केले की खेती अपनाई और पांच बीघे खेत में 1600 पौधे लगाकर खेती को नए नजरिए से देखना शुरू किया।

मुनाफे का गणित भी है आसान 
प्रमोद बताते हैं कि वर्ष 2025 में उन्हें 80 हजार रुपये का मुनाफा हुआ था। इस साल उन्होंने 8 बीघे में 3000 नए पौधे रोपे हैं। उनके अनुसार एक बीघे में करीब 35 हजार रुपये की लागत आती है और उससे लगभग 1 लाख रुपये तक की कमाई हो सकती है।

खेत से ही बिक जाती है फसल
किसानों के सामने अक्सर सबसे बड़ी समस्या फसल बेचने की होती है। उपज को मंडी तक पहुंचाना, परिवहन का खर्च उठाना और सही खरीदार तलाशना अतिरिक्त चुनौती बन जाता है। प्रमोद के मामले में तस्वीर अलग है। केले की तैयार फसल खरीदने के लिए व्यापारी खुद खेत तक पहुंच रहे हैं। इससे उन्हें दूर की मंडी नहीं जाना पड़ता और समय व परिवहन दोनों की बचत होती है।

प्रमोद का प्रयास उन युवाओं के लिए खास संदेश है जो खेती को लेकर असमंजस में रहते हैं। उनका कहना है कि नौकरी के विकल्प तलाशना जरूरी है, पर अपनी जमीन और उपलब्ध संसाधनों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। खेती में संभावनाएं हैं, बशर्ते उसे योजनाबद्ध तरीके से किया जाए।

सोच-समझकर बोएं फसल
उनके मुताबिक किसी भी फसल को लगाने से पहले उसकी बाजार में मांग, लागत, उत्पादन अवधि और बिक्री की व्यवस्था की जानकारी जरूर लेनी चाहिए। केवल दूसरे किसान को देखकर फसल शुरू करने के बजाय अपनी जमीन, पानी और बाजार की स्थिति को ध्यान में रखकर फैसला करना ज्यादा जरूरी है।

मोबाइल बना खेती का साथी
युवा किसान मानते हैं कि आज की खेती में मोबाइल और इंटरनेट भी उपयोगी साधन बन सकते हैं। मौसम, कृषि तकनीक, बाजार और नई फसलों की जानकारी आसानी से मिल जाती है, जिससे किसान अपने फैसले ज्यादा जानकारी के आधार पर ले सकता है।

छोटी शुरुआत, बड़ी सीख
प्रमोद की कहानी बताती है कि कृषि में सफलता की राह हमेशा बड़े निवेश से ही शुरू हो, यह जरूरी नहीं। कई बार छोटे स्तर का प्रयोग भी किसान को नई दिशा दे देता है। जरूरत है तो बस सीखने की इच्छा, मेहनत और बाजार को समझने की।

सरकारी सहारे का प्रोत्साहन
केले की खेती को बढ़ावा देने के लिए किसानों को सरकारी योजनाओं से भी मदद मिलती है। प्रमोद के मुताबिक उद्यान विभाग की ओर से केले की खेती के लिए करीब 40 हजार रुपये प्रति हेक्टेयर का अनुदान मिलता है, जिससे लागत का कुछ हिस्सा संभालने में मदद मिलती है। उनके लिए यह सहायता इस प्रयोग को आगे बढ़ाने का प्रोत्साहन है। उनका कहना है कि किसान विभागीय योजनाओं की जानकारी रखें और पात्रता के अनुसार लाभ उठाएं, तो आधुनिक खेती की लागत कुछ हद तक घट सकती है।

डिग्री और मिट्टी, दोनों साथ
आज जब ग्रामीण युवा रोजगार के नए विकल्प तलाश रहे हैं, खजुरिया मिश्र गांव के प्रमोद कुमार चौधरी केले के पौधों के बीच एक अलग कहानी लिख रहे हैं। डिग्री उनके हाथ में है और खेती उनके पैरों के नीचे की जमीन से जुड़ी है। दोनों को साथ लेकर चलने का उनका प्रयास बताता है कि गांव की मिट्टी में भी रोजगार और आत्मनिर्भरता के नए अवसर तलाशे जा सकते हैं।
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