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Smart Village : विदेश में पढ़ाई जाती है भारत के इस गांव की कहानी, बेटी पैदा होने पर निभाई जाती है अनूठी परंपरा

गांव जंक्शन, नोएडा Published by: Mohammad Aamil Updated Mon, 02 Jun 2025 05:00 PM IST
सार

पिपलांत्री गांव की सफलता को विदेशों में भी सराहा गया है। डेनमार्क की सरकार ने इसे अपने स्कूल पाठ्यक्रम में शामिल किया है। वहां से मास मीडिया विश्वविद्यालय के छात्र अध्ययन के लिए यहां आते हैं। भारत के विभिन्न राज्यों जैसे राजस्थान, असम, पश्चिम बंगाल में भी इस गांव की कहानी बच्चों को पढ़ाई जाती है।

पिपलांत्री गांव की कहानी
पिपलांत्री गांव की कहानी - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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राजस्थान के राजसमंद जिले का एक छोटा सा गांव पर्यावरण संरक्षण और बेटियों के सम्मान के लिए पूरी  दुनिया में मिसाल बन गया है। राजसमंद शहर से लगभग 15 किलोमीटर दूर 7000 की आबादी वाले इस गांव का नाम पिपलांत्री है। यहां कभी पानी की किल्लत, बेरोजगारी और बंजर जमीन से लोग जूझते थे। आज यह गांव हरियाली, समृद्धि और सामाजिक जागरूकता का प्रतीक बन गया है। इस गांव में बेटी के जन्म पर अनूठी परंपरा निभाई जाती है। इसकी पहचान देश की सीमाओं से आगे तक फैली हुई है। डेनमार्क तक में इसकी मिसाल दी जाती है, जहां स्कूलों में इसकी कहानी पढ़ाई जाती है।

बेटियों के जन्म पर  लगाए जाते हैं 111 पौधे
गांव में बेटियों के जन्म पर 111 पौधे लगाने की अनूठी परंपरा निभाई जाती है। इसकी शुरुआत साल 2005 में यहां के सरपंच श्याम सुंदर पालीवाल ने की थी। ये पौधे सरकारी जमीन पर लगाए जाते हैं, लेकिन उनकी देखरेख लड़की के परिवार द्वारा की जाती है। इन पेड़ों से भविष्य में होने वाली आमदनी का उपयोग लड़की की शिक्षा और शादी के लिए होता है। सिर्फ बेटियों के जन्म पर ही नहीं, गांव में किसी की मृत्यु होने पर भी स्मृति में पौधे लगाए जाते हैं, जिससे हर भावनात्मक अवसर को हरियाली से जोड़ा गया है।

समस्याओं से घिरा रहता था पिपलांत्री
पिपलांत्री गांव पूर्व में समस्याओं से घिरा हुआ था। एक समय था जब गांव में 500 फीट नीचे भी पानी नहीं मिलता था, लेकिन अब यहां के प्राकृतिक झरने बहते हैं और भूजल स्तर में जबरदस्त सुधार आया है। इस गांव को अनोखा और सुंदर बनाने में श्याम सुंदर पालीवाल का बड़ा अहम रोल है। जानकारी के मुताबिक, वर्ष 2005 में जब श्याम सुंदर पालीवाल गांव के सरपंच बने, तो पिपलांत्री समस्याओं से घिरा हुआ था। गांव में पानी का गहरा संकट, बेरोजगार युवा, अशिक्षा, और सूखी जमीन गांव के लोगों की जिंदगी को शापित किए हुई थी। 

सरपंच ने बदल दी गांव की तकदीर 
सरपंच बनने के बाद श्याम सुंदर पालीवाल ने गांव की तकदीर बदलने की ठान ली। उन्होंने जल संरक्षण के लिए गांव में एनीकट बनवाए, पहाड़ियों पर पौधारोपण कराया और स्कूलों का जीर्णोद्धार शुरू किया। उनकी इस पहल से सिर्फ पर्यावरण ही नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक पहलुओं को भी छुआ।

उन्होंने गांव के विकास के लिए खूब काम किए, इसके लिए उन्हें गांव के लोगों का भरपूर साथ मिला।  नतीजा यह हुआ कि 2007 में गांव को स्वच्छ ग्राम पंचायत का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। कई किताबें और डॉक्यूमेंट्री फिल्में इस गांव पर बनाई गईं। प्रतियोगी परीक्षाओं में इस गांव से जुड़े सवाल तक पूछे जाते हैं।

डेनमार्क में पढ़ाई जाती है गांव की कहानी
पिपलांत्री गांव की सफलता को विदेशों में भी सराहा गया है। डेनमार्क की सरकार ने इसे अपने स्कूल पाठ्यक्रम में शामिल किया है। वहां से मास मीडिया विश्वविद्यालय के छात्र अध्ययन के लिए यहां आते हैं। भारत के विभिन्न राज्यों जैसे राजस्थान, असम, पश्चिम बंगाल भी इस गांव की कहानी बच्चों को पढ़ाई जाती है।
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